अध्याय 3 : भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ
प्र० 1. हित समूह प्रकार्यशील लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं। चर्चा कीजिए।
उत्तर- • हित समूहों का गठन राजनीति के क्षेत्र में कुछ विशेष हितों की पूर्ति के लिए किया जाता है। ये हित समूह सरकार पर अपना दबाव कायम करते हैं।
• यदि कुछ समूहों को ऐसा प्रतीत होता है कि उनके हित का ध्यान नहीं रखा जा रहा है, तो वे कोई वैकल्पिक पार्टी बना लेते हैं।
• लोकतंत्र लोगों का, लोगों के लिए तथा लोगों के द्वारा निर्मित शासन प्रणाली है। इस प्रणाली के अंतर्गत विभिन्न हित समूहों की सरकार की कार्य प्रणाली के बारे में जानकारी दी जाती है।
• हित समूह निजी संगठन होते हैं। ये सार्वजनिक नीतियों के निर्माण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं।
• ये एक गैर-राजनीतिक दल होते हैं तथा इनका लक्ष्य अपने हितों की पूर्ति करना होता है। राजनीतिक दल एक संगठित संस्था होते हैं, जिनका लक्ष्य सत्ता प्राप्त कर विशेष कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करना होता है। विभिन्न हित समूह राजनीतिक पार्टियों पर दबाव कायम करते हैं।
• इन हित समूहों को जब तक मान्यता नहीं मिल जाती, एक आंदोलन के तौर पर जाने जाते हैं।
प्र० 2. संविधान सभा की बहस के अंशों का अध्ययन कीजिए। हित समूहों को पहचानिए। समकालीन भारत में किस प्रकार के हित समूह हैं? वे कैसे कार्य करते हैं?
उत्तर- बहस के अंश
• के०टी० शाह ने कहा कि लाभदायक रोजगार को श्रेणीगत बाध्यता के द्वारा वास्तविक बनाया जाना चाहिए और राज्यों की यह जिम्मेदारी है कि वह सभी समर्थ एवं योग्य नागरिकों की लाभदायक रोजगार उपलब्ध कराए।
• बी० दास ने सरकार के कार्यों को उचित अधिकार क्षेत्र तथा अनुचित अधिकार क्षेत्र में विभाजित किए जाने का विरोध किया। उनका कहना था-‘मैं समझता हूँ कि भुखमरी को समाप्त करना, सभी नागरिकों को समाजिक न्याय देना और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार को प्राथमिक कर्तव्य है।…..लाखों लोगों की सभा यह मार्ग नहीं हूँढ़ पाई कि संघ का संविधान उनकी भूख से मुक्ति कैसे सुनिश्चित करेगा, समाजिक न्याय, न्यूनतम मानक जीवन-स्तर और न्यूनतम जन-स्वास्थ्य कैसे सुनिश्चित करेगा।”
अंबेडकर को उत्तर – “संविधान का जो प्रारूप बनाया गया है, वह देश के शासन के लिए केवल एक प्रणाली उपलब्ध कराना है। इसकी यह योजना बिल्कुल नहीं है कि अन्य देशों की तरह कोई विशेष दल को सत्ता में लाया जाए। यदि व्यवस्था लोकतंत्र को संतुष्ट करने में खरी नहीं, उतरती है, तो किसे शासन में होना चाहिए, इसका निर्धारण जनता करेगी।”
• भूमि सुधार के विषय पर नेहरू ने कहा कि सामाजिक शक्ति इस तरह की है कि कानून इस संदर्भ में कुछ नहीं कर सकता, जो इन दोनों की गतिशीलता की एक प्रतिकृति है। “यदि कानून और संसद स्वयं को बदलते परिदृश्य के अनुकूल नहीं कर पाएँगे, तो स्थितियों पर नियंत्रण कठिन होगा।”
• संविधान सभा की बहस के समय आदिवासी हितों की रक्षा के मामले में जयपाल सिंह से नेहरू ने कहा-”यथासंभव उनकी सहायता करना हमारी अभिलाषा और निश्चित इच्छा है; यथासंभव उन्हें कुशलतापूर्वक उनके लोभी पड़ोसियों से बचाया जाएगा और उन्हें उन्नत किया जाएगा।”
• संविधान सभा ने ऐसे अधिकारों को जिन्हें न्यायालय नहीं लागू करवा सकता, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धातों के शीर्षक के रूप में स्वीकार किया तथा इनमें सर्व-स्वीकृति से कुछ अतिरिक्त सिद्धांतों को जोड़ा गया। इनमें के० संथानम का वह खंड भी है, जिसके अनुसार राज्य को ग्राम-पंचायतों की स्थापना करनी चाहिए तथा स्थानीय स्वशासन के लिए उन्हें अधिकार और शक्ति भी देनी चाहिए।
प्र० 3. विद्यालय में चुनाव लड़ने के समय अपने आदेश पत्र के साथ एक फड़ बनाइए (यह पाँच लोगों के एक छोटे समूह में भी किया जा सकता है, जैसे पंचायत में होता है।)
उत्तर- विद्यालय पंचायत के एक सदस्य के रूप में हमारा ध्यान निम्न विषयों पर होगा-
• पंचायत के सदस्य छात्रों में स्वअनुशासन की भावना लाने की शिक्षा देने का प्रयास करेंगे। छात्रों के बीच हम अन्य छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत बनेंगे।
• सह-शिक्षा वाले विद्यालयों में हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि लड़कियों को सम्मान तथा सुरक्षा मिले। अतएवं हम अप्रत्यक्ष रूप से एक स्वस्थ समाज के निर्माण की नींव रखने की कोशिश करेंगे।
• हम एक ऐसा तरीका विकसित करेंगे, जिसके द्वारा छात्रों को विद्यालय में ही स्वाध्याय और व्यावसायिक कोर्स के लिए विशेष कोचिंग दी जा सके।
• पंचायत विशेष श्रेणी वाले बच्चों पर विशेष ध्यान देगी तथा उनके लिए शिक्षा को बेहतर बनाएगी।
पंचायत प्राचार्य से समन्वय स्थापित करेगी तथा उचित शिक्षक-छात्र अनुपात, नामांकन नीति, यूनीफार्म, मध्याह्न भोजन के वितरण आदि मसलों पर दबाव बनाने का काम करेगी।
• पंचायते प्राचार्य तथा प्रबंधकीय कर्मचारियों के बीच | खेलकूद, पाठ्येत्तर गतिविधियों तथा विद्यालय में शिक्षा हेतु नवीन तकनीक के प्रयोग के मामले पर तालमेल बिठाने का प्रयास करेंगी।
प्र० 4. क्या आपने बाल मजदूर तथा मजदूर किसान संगठन के बारे में सुना है? यदि नहीं, तो पढ़ा कीजिए और उनके बारे में 200 शब्दों में एक लेख लिखिए।
उत्तर- बाल मजदूरी-मानव जगत् के सपनों एवं उमंगों का पुंज बालकों को माना गया है। बच्चे राष्ट्र के भविष्य का नेतृत्व करते हैं। वे देश की प्रगति का आइना एवं भावी कर्णधार हैं। उनका चमकता हुआ चेहरा यदि किसी देश की प्रगति और खुशहाली का प्रतीक है। तो उनका मुरझाया हुआ चेहर देश की विषमता एवं विपन्नता का प्रतीक है। हालाँकि विडंबना इस बात की है कि आज अधिकतर बच्चों का जीवन संघर्षों एवं असामान्य परिस्थितियों में बीत रहा है।
प्राचीनकाल से ही बाल श्रमिक भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं। हालाँकि उस समय गरीबी, रूढ़िवादिता तथा भाग्यवादिता के कारण उनकी शिक्षा तथा उनके सर्वांगीण विकास की ओर ध्यान नहीं दिया गया। फलतः उनका बचपन मजदूरी की के हवनकुंड में होम कर दिया गया। उनके हाथ में कलम और किताब के स्थान पर हँसिया और फावड़ा पकड़ा दिया गया। वही सिलसिला बदले हुए परिवश में कुछ। हद तक प्यारी है। बाल मजदूरी को बढ़ावा देने में सबसे अहम भूमिका उन किसानों, छोटे व्यवसायियों एवं उद्योगपतियों को है जो आधी मजदूरी पर छोटे बच्चों के श्रम का अधिक से अधिक दोहन करना चाहते हैं। साथ-साथ “जितने हाथ उतने काम की मानसिकता ने भी बालश्रम को बढ़ावा दिया है।
दुनिया में सबसे ज्यादा बाल मजदूर भारत में ही हैं। 1991 की जनगणना के अनुसार बाल मजदूरों का आंकड़ा 11.3 मिलियन या 2001 में यह आंकड़ा बढ़कर 12.7 मिलियन पहुँच गया। बाल मजदूरों की संख्या में बेतहाश वृद्धि को ध्यान में रखकर सरकार ने चाइल्ड लेबर एक्ट बनायी, जिसके अंतर्गत बाल मजदूरी को अपराध माना गया तथा रोजगार पाने की न्यूनतम आयु 11 वर्ष कर दी। बाल मजदूरी से निपटने के लिए सरकार ने आठवीं तक की शिक्षा अनिवार्य तथा नि:शुल्क कर दिया है किंतु गरीबी और बेबसी के आगे यह योजना अप्रभावी साबित होती दिखाई देती है। माता-पिता बच्चों को इसलिए स्कूल नहीं भेजते हैं कि घर की आमदनी इतनी कम जाएगी कि रोजी-रोटी के लाले पड़े जाएँगे।
अतः यह नि:संदेह रूप से यह कहा जाता है बाल मजदूरी का सिर्फ एक मात्र कारण है-गरीबी। बाल मजदूरी को समाप्त करने के लिए गरीबी को समाप्त करना जरूरी है। ऐसे बच्चों और उनके परिवारों को दो वक्त की खाना मुहैया कराना। इसके लिए सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। साथ-साथ आम जनता की भी इसमें सहभागिता जरूरी है। देश का प्रत्येक सक्षम व्यक्ति ऐसे परिवारों की सहायता करने लगें तो सारी परिदृश्य बदल सकता हैं।
मजदूर किसान संगठननिर्देश – मजदूर किसान संगठनों के बारें में इंटरनेट से अधिक से अधिक जानकारी एकत्र करें एवं उसे स्वयं लेख को स्वरूप में लिखने की कोशिश करें।
प्र० 5. ग्रामीणों की आवाज को सामने लाने में 73 वाँ संविधान संशोधन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। चर्चा कीजिए।
उत्तर- 73 वाँ संशोधन ग्रामीण लोगों की आवाज बुलंद करने हेतु एक मिसाल की तरह है। इसका कारण यह है कि यह संशोधन राज्य के नीति निर्देशक तत्वों तथा पंचायती राज से संबंधित है। यह संशोधन जनता की शक्ति के सिद्धांतों पर आधारित है तथा पंचायतों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है।
अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ। :-
• पंचायतों का स्वायत्तशासी सरकार के रूप में मान्यता।
• आर्थिक विकास तथा सामाजिक न्याय हेतु कार्यक्रम तैयार करने हेतु पंचायतों को शक्तियाँ।
• पंचायतों की एक मजबूत त्रिस्तरीय-ग्राम, प्रखंड तथा जिला स्तर पर व्यवस्था। यह व्यवस्था उन सभी राज्यों में होगी, जहाँ की आबादी 20 लाख से अधिक है।
• यह अधिनियम दिए गए क्षेत्र के कमजोर वर्गों के लिए पंचायतों में हिस्सेदारी, पंचायतों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, वित्तीय व्यवस्था तथा चुनाव इत्यादि के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करता है।
अधिनियम का महत्त्व
• जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की लाने में यह एक क्रांतिकारी कदम था।
• 73 वें संशोधन अधिनियम के दिशा-निर्देशों क आलोक में सभी राज्यों ने अपने यहाँ कानून बनाए।
• इस अधिनियम के कारण पंचायती राज्य का विचार जमीनी स्तर पर यथार्थ रूप में सामने आया।
प्र० 6. एक निबंध लिखकर उदाहरण देते हुए उन तरीकों को बताइए जिनसे भारतीय संविधान ने साधारण जनता के दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण है। और उनकी समस्याओं का अनुभव किया है।
उत्तर- • भारत के संविधान ने हम सबके लिए एक लोकतांत्रिक पद्धति प्रदान की है।
• लोकतंत्र जनता के, जनता से तथा जनता के लिए बनी शासन-व्यवस्था है। यह केवल राजनैतिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय तक ही सीमित नहीं है। यह सभी जाति, धर्म, कुल तथा लिंगों के लिए
समान स्वतंत्रता प्रदान करता है।
• भारत के संविधान ने धर्मनिरपेक्षता को स्थापित किया है। हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं तथा सभी भारतीयों को अपने धर्म के प्रति आस्था रखने की पूरी स्वतंत्रता है। भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को भी समान अधिकार प्रदान करता है तथा उनके विकास के लिए उसमें बहुत सारे उपबंध विद्यमान हैं।
• भारत एक कल्याणकारी राज्य है तथा यहाँ का समाज सामाजिकता से संरक्षित है। यह हमारा कर्तव्य है कि हम सार्वजनिक तथा राष्ट्रीय संपत्ति की हिफाजत करें। यह संविधान हम सबके लिए इस बात का समान अवसर प्रदान करता है कि हम संसाधनों का उपयोग करें तथा आर्थिक विकास के लिए प्रयत्न करें।
• भारत का संविधान यहाँ के नागरिकों को समान रूप से सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय एवं समानता प्रदान करता है। अतएव यह हमारा कर्तव्य है कि हम सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों; जैसे- जनसंख्या नियंत्रण, चेचक, मलेरिया तथा पल्स पोलियो उन्मूलन कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी प्रदान करें। खाद्य सुरक्षा अधिनियम, सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार तथा महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रयास कुछ ऐसे कदम हैं, जिन्हें सरकार ने उठाए हैं, ताकि लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की जा सके।