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class 12 antra chapter 11 notes hindi

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(क) कवित्त
बहुत दिनान………सुजान को ॥

व्याख्या बिन्दु – इस कवित्त में कवि अपनी प्रेयसी सुजान से मिलने की अभिलाषा प्रकट कर रहा है। बहुत दिन तक प्रेयसी के आने की प्रतीक्षा करते-करते तथा उस छबीले मनभावन के शीघ्र आने की सूचना जैसी झूठी बातों पर विश्वास करने से कवि उदास हो गया है। कवि के ‘चाहत चलन ये संदेसों ले सुजन को’ कहने से तात्पर्य यह है कि सुजान के दर्शन की अभिलाषा में कवि के प्राण अध्रों तक आकर अटक गए हैं क्योंकि यह सुजान के आगमन की सूचना लेने के पश्चात ही प्रस्थान करना चाहते है।

आनाकानी आरसी …….. कान खोलि है।
व्याख्या बिंदु-
प्रस्तुत कवित्त में कवि नायिका से कहता है कि तुम कब तक मिलने में आनाकानी करती रहोगी। मुझमें और तुममें एक प्रकार की होड़-सी चल रही है। कवि मौन होकर यह देखना चाहता है कि सुजान कब तक कवि को प्रति उत्तर न देने के प्रण का पालन कर सकती है। कवि को पूर्ण विश्वास है कि उसके हृदय की ‘कूक भरी मूकता’ नायिका को बोलने के लिए बाध्य कर देगी। कवि मुहावरेदार भाषा में प्रेयसी की निष्ठुरता पर व्यंग्य करता है कि वह कब तक कानों में रुई डालकर बैठी रहेगी, कभी तो उसकी पुकार उसके कानों तक पहुँचेगी।

(ख) सवैया
तब तौ छवि………बीच पहार परे।
व्याख्या बिंदु –
प्रस्तुत सवैये में कवि ने विरह और मिलन की अवस्थाओं की तुलना की है। कवि कहता है कि संयोग के समय में तो हम तुम् हें देखकर जीवित रहते थे, अब वियोग में अत्यंत व्याकुल रहते हैं। कवि कहता है कि संयोग की अवस्था में जो नेत्रा पहले तो प्रेयसी सुजान के सौन्दर्य-रस का पान करके जिया करते थे, वही वियोग की अवस्था में सोच-सोच कर जले जा रहे है, अर्थात् संयोगकाल में नेत्रा तथा हृदय अति प्रसन्न रहते थे और अब वियोग के समय वे दुःख के कारण जले जा रहे हैं। सुजान के बिना सुख के सभी साजो-सामान व्यर्थ लग रहे हैं। जहाँ संयोग की अवस्था में हार भी पहाड़ के समान मिलन में बाधक लगता था वहीं वियोगावस्था में प्रेम के मध्य पहाड़ (अनेक व्यवधन, बाधएँ) आ गए हैं।

पूरन प्रेम को……..बांचि न देख्यौ ।
व्याख्या बिंदु-
प्रस्तुत सवैये में कवि ने अपनी प्रेयसी सुजान को पत्रा लिखकर उसके प्रति प्रेम का प्रकटीकरण किया है। उस पत्रा में कवि ने प्रेयसी के चरित्रा के सुन्दर स्वरूप का विशेष रूप से चित्राण किया था। कवि ने हृदय रूपी प्रेम पत्रा पर किसी अन्य कथा का उल्लेख तक न किया। ऐसे हृदय रूपी पत्रा को जब अपनी प्रेयसी सुजान को सप्रेम भेंट किया तो प्रेयसी सुजान ने उसे पढ़कर भी नहीं देखा और अनजान की तरह टुकड़े-टुकड़े कर दिया।

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