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class 12 antra chapter 12 notes hindi

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पाठ परिचय – ‘प्रेमघन की छाया – स्मृति’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का एक संस्मरणात्मक निबन्ध् है। प्रस्तुत निबन्ध् में शुक्ल जी ने हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति अपने प्रारंभिक रूझानों का वर्णन किया है। परिवार के साहित्यिक परिवेश, मित्रा-मंडली के प्रभाव एवं प्रेमघन के सम्पर्क में आने से वे किस प्रकार साहित्य-रचना और प्रवृत्त हुए, उन्होंनें इसका भी वर्णन किया है।

स्मरणीय बिन्दु

  • लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के पिता पफारसी के अच्छे ज्ञाता थे। वे पुरानी हिन्दी कविता के प्रेमी थे। पफारसी कवियों की उक्तियों को हिन्दी कवियों की उक्तियों के साथ मिलाने में उन्हें बड़ा आनन्द आता था। वे प्रायः रात को घर के सब लोगों को एकत्रा करने रामचरितमानस और रामचन्द्रिका पढ़कर सुनाया करते थे। भारतेंदु जी के नाटक उन्हें बहुत प्रिय थे। लेखक ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ नाटक के नायक राजा हरिश्चन्द्र तथा लेखक भारतेंदु हरिश्चन्द्र को एक ही समझता था।फलस्वरूप भारंतेदु जी के प्रति लेखक के बालमन में एक अपूर्व मधुर भावना जागृत हो गई थी।
  • जब आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आठ वर्ष के थे, तब उनके पिता का तबादला राठ तहसील से मिर्जापुर हो गया। उन्होंने पता चला कि भारतेंदु मंडल के प्रसिद्ध कवि उपाध्याय बदरीनाराय ण चैध्री ‘प्रेमघन’ पास ही कहीं रहते हैं। शुक्ल जी के मन में उनके दर्शन की अभिलाषा उत्पन्न हुई। साथी बालकों की मंडली के साथ वह डेढ़ मील का सपफर तय करके चैध्री साहब के मकान में सामने पहुँचे। ऊपर का बरामदा सघन लताओं के जाल से ढका हुआ था, बीच-बीच में खम्भे और खाली जगह थी। काफी इंतजार के बाद उन्हें चैध्री साहब की एक झलक दिखाई दी। उनके बाल बिखरे हुए थे तथा एक हाथ खम्भे पर था। कुछ ही देर में यह छवि आँखों से ओझल हो गई। यही थी ‘प्रेमघन’ की पहली झलक ।
  • समय के साथ-साथ हिन्दी के नूतन साहित्य की ओर लेखक का रूझान बढ़ता गया। उनके घर में जीवन भारत प्रेस की पुस्तकें आती थी। वे पं॰ केदारनाथ जी पाठक के पुस्तकालय से लाकर पुस्तकें पढ़ा करते थे। शुक्ल जी एक बार किसी बारात में शामिल होने काशी गए थे। वहाँ घूमते हुए उन्होनें पं. केदारनाथ जी को एक घर से निकलते देखा। यह पता चलने पर कि वह मकान भारतेंदु जी का है, शुक्ल जी बड़े प्रेम, कुतूहल एवं भावनाओं में लीन होकर उस मकान को देखाने लगे।
    पाठक जी लेखक की यह श्रद्धा और प्रेम देखकर बहुत प्रसन्न हुए तथा दूर तक उनके साथ बातचीत करते हुए गए। यहीं से पाठक जी और शुक्ल जी में गहरी मित्राता हो गई। इस प्रकार भारतेंदु जी के मकान के नीचे पं. केदारनाथ जी का लेखक के भावुक हृदय से परिचय हुआ जो बाद में गहरी दोस्ती में बदल गया।
  • 16 वर्ष की उम्र तक लेखक की समवयस्क हिन्दी-प्रेमियों की एक मंडली बन गई थी, जिनमें प्रमुख थे – श्रीयुत् काशीप्रसाद जी जायसवाल, बा॰ भगवानदास जी हालना, पं० बदरीनारायण गौंड़, पं० उमाशंकर द्विवेदी ।
  • लेखक जिस स्थान पर रहता था, वहाँ अधिकतर वकील, मुख्तारों तथा कचहरी के अपफसरों और अमलों की बस्ती थी। लेखक की मित्रा मंडली की बातचीत प्रायः लिखने-पढ़ने की हिंदी में हुआ करती थी जिसमें निस्संदेह इत्यादि शब्द आया करते थे। बस्ती के उर्दूभाषी लोगों को उनकी बोली अनोखी लगती थी। उन्होनें इस मंडली का नाम ‘निस्संदेह’ रख दिया था।
  • चौधरी साहब भारतेंदु मंडल के प्रसिद्ध कवि थे। वे पुराने एवं प्रतिष्ठित कवियों में से थे। उनके रहन सहन और व्यवहार से उनकी रईसी प्रकट होती थी। उनके संवाद सुनने लायक होते थे। उनकी बातचीत का अंदाज निराला था। उनको सुनने की जिज्ञासा हमेशा लेखक के मन में बनी रहती थी। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे । वरिष्ठ एवं अनुभवी होने के कारण लेखक तथा उसके मित्रा चौधरी साहब को एक पुरानी चीज समझा करते थे परन्तु चौधरी साहब के प्रति प्रेम एवं आदर का भाव सदैव बना रहता था तथा उन्हें सुनने की इच्छा निरंतर बनी रहती थी। अतः इस पुरातत्व की दृष्टि से प्रेम और कुतुहल का एक अद्भुत मिश्रण रहता था।
  • बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ एक हिन्दुस्तानी रईस थे। बसंत पंचमी, होली आदि त्योहारों पर उनके यहाँ उत्सव हुआ करते थे। उनकी बातों में विलक्षण वक्रता थी। उनकी बातचीत का ढंग निराला था। वे बहुत विनोदप्रिय एवं हाजिर जवाब भी थे।

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