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class 10 political science chapter 6 solution hindi

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अध्याय – 6
राजनीतिक दल

याद रखने योग्य बातें :-

राजनीतिक दल
1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885 में गठित)

एजेंडा:-
इस दल ने धर्मनिरपेक्षता और कमजोर वर्गों
तथा अल्पसंख्यक समुदायों के हितों को अपना
मुख्य एजेंड बनाया है। यह दल नई आर्थिक नीतियों का समर्थक है।

राजनीतिक दल
2. भारतीय जनता पार्टी
(1980 में गठित)

एजेंडा:-
भारत की प्राचीन संस्कृति और मूल्यों से प्रेरणा
लेकर मजबूत और आधुनिक भारत बनाने का
लक्ष्य। पार्टी जम्मू कश्मीर को क्षेत्रीय और
राजनीतिक स्तर पर विशेष दर्जा देने के खिलाफ
है। यह देश में रहने वाले सभी धर्म के लोगों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने और धांतरण पर रोक लगाने के पक्ष में है।


राजनीतिक दल
3. बहुजन समाज पार्टी
(1984 में गठित)

एजेंडा:-
पार्टी साहू महाराज, महात्मा फूले, पेरियार
रामास्वामी नायकर और अम्बेडकर के विचारों
और शिक्षाओं से प्रेरणा लेती है। दलितों और कमजोर वर्ग के लोगों के कल्याण और उनके हितों की रक्षा के मुद्दों पर सबसे ज्यादा सक्रिय है।


राजनीतिक दल
4. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवाद
(1964 में गठित)

एजेंडा:-
मार्क्सवाद – लेनिनवाद में आस्था।
माकर्सवादी समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की समर्थक तथा साम्राज्यवाद और सांप्रदायिकता बिरोधी। यह पार्टी भारत में सामाजिक आर्थिक न्याय का लक्ष्य साधने में लोकतांत्रिक चुनावों को सहायक और उपयोगी मानती है।

राजनीतिक दल
5. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
(1925 में गठित)

एजेंडा:-
मार्क्सवाद लेनिनवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र
में आस्था, अलगाववादी और सांप्रदायिक ताकतों
की विरोधी यह पार्टी संसदीय, लोकतंत्र को मजदूर वर्ग, किसानों और गरीबों के हितों को आगे बढ़ाने का एक उपकरण मानती है।

राजनीतिक दल
6. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी
(1999 में गठित)

एजेंडा:-
लोकतंत्र, गांधीवादी, धर्म निरपेक्षता, समता, सामाजिक न्याय और संघवाद में आस्था। वह पार्टी भारत में जन्मे नागरिकों के लिए आरक्षण चाहती है।


2. राजनीतिक दल का अर्थ – एक ऐसा संगठित समूह जो चुनाव लड़ने और राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से काम करती है।
3. राजनीतिक दल के तीन प्रमुख हिस्से 1) नेता 2) सक्रिय नेता 3) अनुयायी या समर्थक।
4. अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवारों के बीच लड़ा जाता है।
5. दल अलग-अलग नीतियों और कार्यक्रमों को मतदाताओं के सामने रखते हैं और मतदाता अपनी पसंद की नीतियों और कार्यक्रमों का चुनाव करते
है
6. दल देश के कानून निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। संविधान संशोधन में भी इनका योगदान होता है।
7. चुनाव में कम सीटें पाने वाले दल को विपक्षी दल कहते है।
8. भारत में पुनाव आयोग द्वारा पंजीकृत दलों की संख्या 750 से ज्यादा है।
9. कई देशों में केवल एक ही दल को सरकार बनाने और चलाने की अनुमति है। इसे एक दलीय व्यवस्था कहते हैं। उदाहरण चीन, जहाँ कम्युनिस्ट पार्टी का शासन है।
10. कुछ देशों में सत्ता दो मुख्य दलों के बीच बदलती रहती है इसे दो दलीय व्यवथा कहते हैं। उदाहरण – संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन।
11. जब अनेक दलों को सत्ता में आने का ठीक-ठाक अवसर हो तो इसे बहुदलीय व्यवस्था कहते हैं- उदाहरण- भारत।
12. शासक दल – जिस दल का शासन हो यानि जिसकी सरकार बनती है।
13. दल-बदल – विधायिका के लिए किसी दल विशेष से निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधि का उस दल को छोड़कर अन्य किसी दल में चले जाना।

1 अंक वाले प्रश्न

1. किसी एक प्रांतीय दल का नाम लिखें।

उत्तर :- सिक्किम लोकतांत्रिक मोर्चा, मिजो नेशनल फ्रंट बीजू जनता दल या कोई अन्य।

2. भारतीय जनता पार्टी का मुख्य प्रेरक सिद्धांत क्या है?

उत्तर :- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हिंदुत्व एक प्रमुख तत्व है।

3. किसी देश के लिए कानून निर्माण में निर्णायक भूमिका कौन निभाता है?

उत्तर :- राजनीतिक दल

लघु । दीर्घ प्रश्न (3/5 अंक)

1. राजनीतिक दलों के कार्य लिखिए।

उत्तर :- * चुनाव लड़ना
* कानून बनाना
* सरकार बनाना व चलाना
* विपक्ष की भूमिका
* जनमत का निर्माण

2. राष्ट्रीय राजनीतिक दल और प्रांतीय दलों में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर :- प्रांतीय राजनीतिक दल :- जब किसी दल को किसी राज्य विधान सभा चुनाव की कुल मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त होता है
अथवा वह कम से कम दो सीटों पर विजयी होता है तो उसे प्रांतीय राजनीतिक दल कहते हैं।

राष्ट्रीय राजनीतिक दल – जब किसी दल को लोकसभा चुनाव में किन्हीं चार राज्यों की विधान सभा चुनाव में कुल वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त होता है और चार लोकसभा सीटें जीत ले तो उसे राष्ट्रीय राजनीतिक दल कहते है।


3.भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पाटी मार्क्सवादी में अन्तर स्पष्ट करें।

उत्तर :- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी :-
1) इसका गठन 1925 में हुआ
2) इसका जनाधार केरल, पश्चिम बंगाल, पंजाब, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडू में है।
3) 2004 के चुनाव में इसे 1.4 प्रतिशत वोट और लोकसभा की 10 सीटें हासिल हुई।
4) यह अपने विचारों से उदार मानी जाती हैं।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी :-
1) इसका गठन 1964 में हुआ।
2) पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा में मजबूत आधार है।
3) 2004 के चुनाव में इसने करीब 6 फीसदी वोट और लोकसभा की 43 सीटें हासिल की।
4) यह विचारों से अधिक कठोर मानी जाती है।

4. विभिन्न प्रकार की दलीय व्यवस्था का उल्लेख करें।

उत्तर :- 1) एक दलीय प्रणाली – देश में केवल एक दल को ही सरकार बनाने की अनुमति होती है। जैसे-चीन।
2) दो दलीय प्रणाली- देश में दो दलों को मान्यता प्राप्त होती है। जैसे ब्रिटेन तथा अमेरिका।
3) बहुदलीय प्रणाली- देश में दो से अधिक दलों की व्यवस्था होती है। जैसे – भारत और फ्रांस।

5. वर्तमान में राजनीतिक दलों के समक्ष चुनौतियों की व्याख्या करें।

उत्तर :- 1) आंतरिक लोकतंत्र का अभाव।
2) वंशवादी उत्तराधिकार।
3) धन एवं बल का प्रयोग।
4) सार्थक विकल्प का अभाव।
5) दल के सामान्य सदस्यों की उपेक्षा।

6. प्रांतीय दल भारत में संघवाद को मजबूत करने में किस प्रकार सहायता करते है।

उत्तर :- राष्ट्रीय दल प्रांतीय दलों के साथ गठबंधन करने को मजबूर हुए हैं। 1996 के बाद से लगभग प्रत्येक प्रांतीय दल को एक या दूसरी राष्ट्रीय स्तर की
गठबंधन सरकार का हिस्सा बनने का अवसर मिला है। इससे हमारे देश में संघवाद और लोकतंत्र मजबूत हुए हैं। राष्ट्रीय सरकार के लिए क्षेत्रीय दलों की मांगों को स्वीकार करना आवश्यक हो गया है।

7. राजनीतिक दलों एवं नेताओं को सुधारने के लिए सरकार द्वारा किये गये प्रयासों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर :- 1) दल परिवर्तन पर नियन्त्रण (दल बदल विरोधी कानून द्वारा)
2) दल बदल करने पर अपनी सीट खोनी पड़ती है।
3) सम्पत्ति की घोषणा करना।
4) आपराधिक मामले से सम्बन्धित शपथ पत्र दायर करना अनिवार्य है।
5) आयकर का रिटर्न भरना भी जरूरी बना दिया है।

8. लोकतंत्र की गुणवत्ता जन सहभागिता के स्तर पर निर्भर करती है। क्याआप इस कथन से सहमत है? उत्तर के समर्थन में तर्क दें।

उत्तर :- हाँ, क्योंकि –
1) लोकतंत्र का उद्देश्य जनता का जनता के द्वारा शासन है।
2) लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लिये बिना राजनीतिक दलों में सुधार लाना कठिन।
3) सामान्य जनता की भागीदारी आवश्यक।
4) उपयुक्त उम्मीदवार का चयन।
5) असहभागिता से सत्ता गलत एवं अक्षम लोगों के हाथों में चली जाती है।


9. विगत कुछ दशकों से भारत में राष्ट्रीय दलों की तुलना में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा है। क्या यह भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है? अपने
उत्तर के समर्थन तर्क दीजिए।

उत्तर :- हाँ, यह भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। इसके समर्थन में तर्कः
1) केन्द्रीय। राष्ट्रीय राजनीति में साथ गठबंधन करने पर मजबूर हुए हैं।
2)
राष्ट्रीय दल, क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करने पर मजबूर हुए है
3) राष्ट्रीय दल, क्षेत्रीय दलों की अनदेखी नहीं कर सकते।
4) केन्द्रीय सरकार को सभी क्षेत्रों के विकास पर ध्यान देना होगा।
5) क्षेत्रीय दलों की भागीदारी राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ी है।

10. लोकतंत्र की सफलता राजनीतिक दलों पर निर्भर करती है। परंतु भारत में राजनीतिक दलों के व्यवहार ने इसे बुरी तरह प्रभावित किया है।
लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए आप राजनीतिक दलों में कौन-कौन से सुधार लाना/देखना चाहेंगे?

उत्तर :- राजनीतिक दलों में सुधारः-
1) राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का बहाल करना।
2) दल-बदल कानून को प्रभावी बनाना।
3) चुनाव में काले धन के प्रयोग पर रोक लगाना।
4) जिन लोगों के विरूद किसी भी तरह का आपराधिक मुकदमा चल रहा है, उनके चुनाव लड़ने पर रोग लगाना।
5) जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार।

प्रश्न अभ्यास
पाठ्यपुस्तक से


प्रश्न 1. दबाव-समूह और आंदोलन राजनीति को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?

उत्तर :- लोग सरकार से अपनी माँगें मनवाने के लिए कई तरीके अपनाते हैं। लोग इसके लिए संगठन बनाकर अपने हितों को बढ़ावा देने वाले कार्य करते हैं जिसे हित समूह कहते हैं। कभी-कभी लोग बगैर संगठन बनाए अपनी माँगों के लिए एकजुट होने का फैसला करते हैं। ऐसे समूह को आंदोलन कहा जाता है। ये हित समूह या दबाव-समूह और आंदोलन राजनीति पर कई तरह से असर डालते हैं

1. दबाव-समूह और आंदोलन अपने लक्ष्य तथा गतिविधियों के लिए जनता का समर्थन और सहानुभूति हासिल करने की कोशिश करते हैं। इसके लिए सूचना अभियान चलाना, बैठक आयोजित करना अथवा अर्जी दायर करने जैसे तरीकों का सहारा लिया जाता है। ऐसे अधिकतर समूह मीडिया को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं ताकि उनके मसलों पर मीडिया ज्यादा ध्यान दे।
2. ऐसे समूह अक्सर हड़ताल अथवा सरकारी कामकाज में बाधा पहुँचाने जैसे उपायों का सहारा लेते हैं। दबाव-समूह तथा आंदोलनकारी समूह ऐसी युक्तियों का इस्तेमाल करते हैं कि सरकार उनकी माँगों की तरफ़ ध्यान देने के लिए बाध्य हो।
3. व्यवसाय समूह अक्सर पेशेवर ‘लॉबिस्ट’ नियुक्त करते हैं अथवा महँगे विज्ञापनों को प्रायोजित करते हैं। दबाव-समूह अथवा आंदोलनकारी समूह के कुछ व्यक्ति सरकार को सलाह देनेवाली समितियों और आधिकारिक निकायों में शिरकत कर सकते हैं।
इस प्रकार, दबाव-समूह और आंदोलन दलीय राजनीति में सीधे भाग नहीं लेते, लेकिन वे राजनीतिक दलों पर असर डालना चाहते हैं।

प्रश्न 2. दबाव-समूहों और राजनीतिक दलों के आपसी संबंधों का स्वरूप कैसा होता है? वर्णन करें।

उत्तर :- दबाव-समूह दलीय राजनीति में सीधे भाग नहीं लेते लेकिन वे चुनावों के समय तथा चुनावों के बाद राजनीतिक दलों पर असर डालना चाहते हैं। दबाव-समूह राजनीतिक दलों के माध्यम से ही अपनी माँगें मनवाने की कोशिश करते हैं। दबाव- समूह और राजनीतिक दल के बीच का रिश्ता कई रूप धारण कर सकता है1. कुछ मामलों में दबाव-समूह राजनीतिक दलों द्वारा ही बनाए गए होते हैं अथवा उनका नेतृत्व राजनीतिक दलों के नेता करते हैं

1. कुछ दबाव-समूह राजनीतिक दल की एक शाखा के रूप में काम करते हैं। जैसे- भारत के अधिकतर मजदूर संगठन और छात्र संगठन या तो बड़े राजनीतिक दलों द्वारा बनाए जाते हैं या उनसे संबंधित होते हैं।
2. दबाव-समूह चुनावों के समय राजनीतिक दलों की आर्थिक मदद करते हैं तथा इस मदद के बदले में चुनावों के बाद यदि वह राजनीतिक दल सरकार में आता है तो उस पर ये दबाव डालकर अपने हितों की पूर्ति के लिए नीतियाँ बनवाते हैं। इस प्रकार राजनीतिक दल व दबाव-समूह दोनों एक-दूसरे के लिए जरूरी हैं।
3. अधिकांशतः दबाव-समूहों का राजनीतिक दलों से प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। दोनों परस्पर विरोधी पक्ष लेते हैं फिर भी इनके बीच संवाद कायम रहता है और सुलह की बातचीत चलती रहती है। राजनीतिक दलों के अधिकतर नए नेता दबाव-समूह अथवा आंदोलनकारी समूहों से आते हैं।

प्रश्न 3. दबाव-समूहों की गतिविधियाँ लोकतांत्रिक सरकार के कामकाज में कैसे उपयोगी होती हैं?

उत्तर :- दबाव-समूहों की गतिविधियाँ लोकतांत्रिक सरकार के कामकाज में उपयोगी साबित होती हैं –

1. आम नागरिक की जरूरतों से सरकार को अवगत कराते हैं – ये दबाव-समूह शासकों के ऊपर दबाव डालकर लोकतंत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सरकारें अक्सर धनी और ताकतवर लोगों के अनुचित दबाव में आ जाती हैं। जनसाधारण के हित समूह इस अनुचित दबाव के प्रतिकार में उपयोगी भूमिका निभाते हैं और आम नागरिकों की जरूरतों और समस्याओं से सरकार को अवगत कराते हैं।

2. सरकार की निरंकुशता पर रोक लगाते हैं – सरकार पर यदि कोई एक समूह अपने हित में नीति बनाने के लिए दबाव डालता है तो दूसरा समूह उसके प्रतिकार में दबाव डालेगा कि नीतियाँ उस तरह से न बनाई जाएँ। सरकार निरंकुश नहीं हो पाती, ये समूह सरकार पर अंकुश बनाए रखते हैं तथा सरकार को ये भी पता चलता रहता है कि समाज के विभिन्न वर्ग क्या चाहते हैं। इससे परस्पर विरोधी हितों के बीच सामंजस्य बिठाना तथा शक्ति संतुलन करना संभव होता है।


प्रश्न 4. दबाव-समूह क्या हैं? कुछ उदाहरण बताइए।

उत्तर :- समान आर्थिक हितों वाले वर्ग सरकार से अपनी माँगें मनवाने तथा हित पूरे करवाने के लिए संगठन बनाकर सरकार पर दबाव डालने का काम करते हैं। इन्हें दबाव-समूह कहते हैं। ये दबाव-समूह किसी खास वर्ग के हितों को बढ़ावा देना चाहते हैं। मजदूर संगठन, व्यावसायिक संघ और वकीलों, डॉक्टरों और शिक्षकों के निकाय इस तरह के दबाव-समूह के उदाहरण हैं। ऐसे दबाव-समूहों का सरोकार पूरे समाज का नहीं बल्कि अपने सदस्यों की बेहतरी और कल्याण करना होता है।

प्रश्न 5. दबाव-समूह और राजनीतिक दल में क्या अंतर है?

उत्तर :- दबाव-समूह और राजनीतिक दल में निम्नलिखित अंतर हैं –

1. दबाव-समूह का लक्ष्य सत्ता पर प्रत्यक्ष नियंत्रण करने अथवा हिस्सेदारी करने का नहीं होता, जबकि राजनीतिक दलों का लक्ष्य सत्ता पर प्रत्यक्ष नियंत्रण करके सरकार बनाना या विरोधी दल के रूप में सरकार पर नियंत्रण रखना होता है।
2. दबाव-समूह का निर्माण तब होता है जब समान पेशे, हित, आकांक्षा अथवा मत के लोग एक समान उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एकजुट हों।
राजनीतिक दल के निर्माण के लिए केवल समान राजनीतिक विचारधारा के लोगों का एकजुट होना जरूरी है चाहे उनके आर्थिक हित अलग-अलग हों।
3. राजनीतिक दलों को चुनाव के समय जनता का सामना करना पड़ता है, जबकि दबाव-समूहों को जनता के समर्थन की आवश्यकता नहीं होती।
4. दबाव-समूह दलीय राजनीति में सीधे भाग नहीं लेते लेकिन वे राजनीतिक दलों पर असर डालना चाहते हैं, जबकि राजनीतिक दल सीधे दलीय राजनीति में भाग लेना चाहते हैं।

प्रश्न 6. जो संगठन विशिष्ट सामाजिक वर्ग जैसे मज़दूर, कर्मचारी, शिक्षक और वकील आदि के हितों को बढ़ावा देने की गतिविधियाँ चलाते हैं उन्हें ……………………. कहा जाता है।

उत्तर :- दबाव-समूह।

प्रश्न 7. निम्नलिखित में से किस कथन से स्पष्ट होता है कि दबाव-समूह और राजनीतिक दल में अंतर होता है

(क) राजनीतिक दल राजनीतिक पक्ष लेते हैं जबकि दबाव-समूह राजनीतिक मसलों की चिंता नहीं करते।
(ख) दबाव-समूह कुछ लोगों तक ही सीमित होते हैं जबकि राजनीतिक दल का दायरा ज्यादा लोगों तक फैला होता है।
(ग) दबाव-समूह सत्ता में नहीं आना चाहते जबकि राजनीतिक दल सत्ता हासिल करना चाहते हैं।
(घ) दबाव-समूह लोगों की लामबंदी नहीं करते जबकि राजनीतिक दल करते हैं।

उत्तर :-
(ग) दबाव-समूह सत्ता में नहीं आना चाहते जबकि राजनीतिक दल सत्ता हासिल करना चाहते हैं।

प्रश्न 10. दबाव-समूहों और राजनीतिक दलों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

(क) दबाव-समूह समाज के किसी खास तबके के हितों की संगठित अभिव्यक्ति होते हैं।
(ख) दबाव-समूह राजनीतिक मुद्दों पर कोई-न-कोई पक्ष लेते हैं।
(ग) सभी दबाव -समूह राजनीतिक दल होते हैं।

अब नीचे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प चुनें

(अ) क, ख और ग
(ब) क और ख
(स) ख और ग
(द) क और ग।

उत्तर :- (ब) क और ख सही हैं।

प्रश्न 11. मेवात हरियाणा का सबसे पिछड़ा इलाका है। यह गुड़गाँव और फ़रीदाबाद जिले का हिस्सा हुआ करता था।
मेवात के लोगों को लगा कि इस इलाके को अगर अलग ज़िला बना दिया जाय तो इस इलाके पर ज्यादा ध्यान जाएगा। लेकिन, राजनीतिक दल इस बात में कोई रुचि नहीं ले रहे थे। सन् 1996 में मेवात एजुकेशन एंड सोशल
आर्गनाइजेशन तथा मेवात साक्षरता समिति ने अलग ज़िला बनाने की माँग उठाई। बाद में सन् 2000 में मेवात विकास सभा की स्थापना हुई। इसने एक के बाद एक कई जन-जागरण अभियान चलाए। इससे बाध्य होकर बड़े दलों यानी कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोकदल को इस मुद्दे पर अपना समर्थन देना पड़ा। उन्होंने फ़रवरी 2005 में होने वाले विधान सभा के चुनाव से पहले ही कह दिया कि नया जिला बना दिया जाएगा। नया ज़िला सन् 2005 की जुलाई में बना।

इस उदाहरण में आपको आंदोलन, राजनीतिक दल और सरकार के बीच क्या रिश्ता नज़र आता है? क्या आप कोई ऐसा उदाहरण दे सकते हैं जो इससे अलग रिश्ता बताता हो?

उत्तर :- इस उदाहरण में देखा गया कि मेवात को अलग जिला बनाने के लिए दबाव-समूह और आंदोलनों ने राजनीतिक दलों व सरकार को प्रभावित किया । जब चुनाव का समय आया तो राजनीतिक दलों को दबाव-समूहों के समर्थन की आवश्यकता हुई । इसलिए इन्होंने दबाव-समूहों की बात मानकर मेवात को अलग जिला बना दिया। इससे पता चलता है कि दबावसमूह राजनीतिक दलों पर अपनी माँगों को मनवाने के लिए दबाव डालते हैं तथा राजनीतिक दल सरकार में आने के लिए दबाव- समूहों का समर्थन चाहते हैं।

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