(क) यह दीप अकेला
यह दीप……………… . पंक्ति को दे दो।
मूल भाव – ‘यह दीप अकेला’ कविता में दीप के माध्यम से कवि व्यक्तिगत सत्ता को सामाजिक सत्ता से जोड़ने की बात कर रहा है।
मनुष्य में अतुलनीय सहनशीलता और संघर्ष की क्षमता है। समाज में उसके विलय से समाज और राष्ट्र मजबूत होगा।
व्याख्या बिन्दु – दीप अकेला होने के बावजूद प्रेम से भरा व गर्व से परिपूर्ण होने के कारण अपनों से अलग है। वह मदमाता है क्योंकि वह सर्वगुण सम्पन्न है यदि उसे पंक्ति में सम्मिलित कर लिया जाए तो उस दीप की शक्ति, महत्ता तथा सार्थकता बढ़ जाएगी। दीप व्यक्ति का प्रतीक है, कवि उसे पंक्ति में ख्यधरा से जोड़ना चाह रहा है। दीप के लिए पनडुब्बा, समिध, मधु, गोरस, अंकुर, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुत विश्वास तथा अमृत -पूतपय आदि उपमानों का प्रयोग किया गया है। ये सभी उपमान एक स्नेह भरे दीप के लिए पूर्णतया उपयुक्त है। पनडुब्बा के रूप में वह सच्चे मोतियों का लाने वाला है अर्थात् खतरों से खेलने वाला है, तो समिध; यज्ञ की लकड़ीद्ध बन कर संघर्षशील तथा दृढ़निश्चयी है। मधु एवं गोरस के रूप में माधुर्य एवं पवित्रा अमृतमय दुग्ध् के समान सुख देने वाला स्नेहशील, परोपकारी है। वह अंकुर की तरह स्वयं पैदा होकर विशाल सूर्य को निडरता से ताकता है, वह उत्साही है यह स्वयं ब्रहमा का रूप में अर्थात दीप ;मनुष्यद्ध स्वयं तक ही सीमित नही है। उसे सांसारिक गतिविधियों में शामिल करके सर्वजन हिताय प्रयोग में लाया जाए तो सम्पूर्ण मानवता लाभान्वित हो सकेगी। ‘यह अद्वित्तीय यह मेरा, यह मैं स्वयं विसर्जित’ पंक्ति के द्वारा कवि दीप को ‘स्व’ का भाव प्रदान करता हुआ कहता है कि व्यक्ति अपनी अलग पहचान बनाते हुए समाज हित में समर्पित हो जाए तो अत्याधिक श्रेयस्कर होगा। व्यक्तिगत सत्ता का यदि सामाजिक व राष्ट्रीय सत्ता में विलय हो जाए तो समाज, राष्ट्र एवं व्यक्ति सभी का उत्थान होगा।
दीप प्रकाश का, ज्ञान का तथा सभ्यता का प्रतीक है। कविता में इसे सामाजिक इकाई अर्थात व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है।
जब कहीं समाज में निंदा, अपमान, घृणा तथा अनादर एवं उपेक्षा का अंधकार पफैलता है, तो दीप उसे प्रकाशमान कर अनुकूल वातावरण प्रदान करता है। व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों में भी करूणामय होकर, द्रवित होकर, जागरूकता का परिचय देता हुआ, अनुराग से देखता हुआ, सभी को गले लगाने वाली ऊँची उठी भुजाओं वाला बनकर आत्मीयता का परिचय दे ता है। वह सदैव जागृत तथा श्रद्ध से युक्त रहता है। अंधेरे में प्रकाश की किरण बनकर निंदा, अपमान, घृणा और अवज्ञा को दूर करता है, तथा अनुकूल वातावरण तैयार करता है।
(ख) मैनें देखा, एक बूँद
मैंने देखा…..नश्वरता के दाग से।
मूलभाव:- कवि ने इस कविता के माध्यम से जीवन में क्षण के महत्व को तथा क्षणभंगुरता को प्रतिष्ठापित किया है। बूँद जब तक समुद्र में रहती है उसका कोई अस्तित्व नही होता किंतु जब वह अलग होती है तो सूर्य के स्पर्श से रंगकर सार्थक हो जाती है।
व्याख्या बिंदु:- कवि कहता है एक बूँद का सागर से अलग होने का अर्थ है कि अब उसका अस्तित्व समाप्त होने वाला है, वह शीघ्र नष्ट होने वाली है। बूँद सागर से अलग होकर स्वयं नष्ट हो जाती है, सागर नष्ट नहीं होता। समुद्र; सागरद्ध से कवि का आशय ब्रहम से है जहाँ से बूँद रूपी जीव क्षणभर अर्थात् कुछ समय के लिए अलग होता है और कुछ रंगीन पल व्यतीत कर नश्वरता को प्राप्त होता है अर्थात् मुक्ति को प्राप्त होता है।
सागर की एक बूँद लहरों के टकराने से ऊपर उछल कर अलग हो गई। सूर्य की लालिमा में रंगकर बूँद को पुनः सागर में समाना निरर्थक प्रतीत नहीं होता क्योकि उस एक क्षण वह अस्त होते हुए सूर्य की आग से रंग कर समाप्त हो गई, लेकिन बूँद ने क्षणभर के लिए अपनी स्वछंदता का आनंद लिया। उसने अपनी नश्वरता के दाग से मुक्ति पा ली। उसी प्रकार अपने क्षणभंगुर जीवन को परम्ब्रहम के प्रकाश से आलोकित कर मनुष्य को नश्वरता अर्थात् मृत्यु के भय से मुक्ति अनुभव करनी चाहिए।