प्रश्न 1. पर्यावरण के प्रति बढ़ते सरोकारों का क्या कारण है? निम्नलिखित में सबसे बेहतर विकल्प चुनें।
(क) विकसित देश प्रकृति की रक्षा को लेकर चिंतित हैं।
(ख) पर्यावरण की सुरक्षा मूलवासी लोगों और प्राकृतिक पर्यावासों के लिए जरूरी है।
(ग) मानवीय गतिविधियों से पर्यावरण को व्यापक नुकसान हुआ है और यह नुकसान खतरे की हद तक पहुँच गया है।
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर: (ग) मानवीय गतिविधियों से पर्यावरण को व्यापक नुकसान हुआ है और यह नुकसान खतरे की हद तक पहुँच गया है।
प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों में प्रत्येक के आगे सही या गलत का चिह्न लगायें ये कथन पृथ्वी सम्मेलन के बारे में हैं।-
(क) इसमें 170 देश, हजारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भाग लिया।
(ख) यह सम्मेलन संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में हुआ।
(ग) वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दों ने पहली बार राजनीतिक धरातल पर ठोस आकार ग्रहण किया ।
(घ) यह महासम्मेलनी बैठक थी।
उत्तर: (क) सही,
(ख) सही,
(ग) सही,
(घ) सही।
प्रश्न 3. ‘विश्व की साझी विरासत’ के बारे में निम्नलिखित में कौन-से कथन सही हैं?
(क) धरती का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष को ‘विश्व की साझी विरासत’ माना जाता है।
(ख) ‘विश्व की साझी विरासत’ किसी राज्य के संप्रभु क्षेत्राधिकार में नहीं आते।
(ग) ‘विश्व की साझी विरासत’ के प्रबंधन के सवाल पर उत्तरी और दक्षिणी देशों के बीच मतभेद हैं
(घ) उत्तरी गोलार्द्ध के देश ‘विश्व की साझी विरासत’ को बचाने के लिए दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों से कहीं ज्यादा चिंतित हैं।
उत्तर: (क) सही,
(ख) सही,
(ग) सही,
(घ) गलत।
प्रश्न 4. रियो सम्मेलन के क्या परिणाम हुये?
उत्तर: रियो सम्मेलन के परिणाम – सन् 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ का पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर केन्द्रित ‘रियो’ या ‘पृथ्वी’ सम्मेलन हुआ इस सम्मेलन के निम्न प्रमुख परिणाम हुए-
- वैश्विक राजनीति के दायरे में पर्यावरण को लेकर बढ़ते सरोकारों को इस सम्मेलन में एक ठोस रूप मिला।
- इसमें जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता और वानिकी के सम्बन्ध में कुछ नियम – आचार निर्धारित हुए।
- इसमें ‘एजेंडा-21’ के रूप में विकास के कुछ तौर-तरीके भी सुझाये गये।
- इसमें ‘टिकाऊ विकास’ की धारणा को विकास रणनीति के रूप में सम्मान प्राप्त हुआ।
- रियो सम्मेलन में पर्यावरण सुरक्षा की साझी परन्तु अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धान्त को मान लिया गया। इसका तात्पर्य है कि पर्यावरण के विश्वव्यापी क्षय में विभिन्न देशों का योगदान अलग-अलग है जिसे देखते हुए इन राष्ट्रों की पर्यावरण रक्षा के प्रति साझी, किन्तु अलग-अलग जिम्मेदारी होगी।
प्रश्न 5. ‘विश्व की साझी विरासत’ का क्या अर्थ है? इसका दोहन और प्रदूषण कैसे होता है?
उत्तर: विश्व की साझी विरासत से आशय: विश्व की साझी विरासत’ का अर्थ है कि ऐसी सम्पदा जिस पर किसी एक व्यक्ति, समुदाय या देश का अधिकार न हो, बल्कि विश्व के सम्पूर्ण समुदाय का उस पर हक हो। विश्व के कुछ हिस्से और क्षेत्र किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं। इसलिए उनका प्रबंधन साझे तौर पर अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है। उन्हें विश्व की साझी विरासत कहा जाता है। इसमें पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष शामिल हैं।
विश्व की साझी विरासत का दोहन:
विश्व की साझी विरासत का दोहन औद्योगीकरण, यातायात, बढ़ते वैश्विक व्यापार के रूप में किया जा रहा है।
विश्व की साझी विरासत में प्रदूषण – विश्व की साझी विरासत को गैर-जिम्मेदाराना ढंग से उपयोग करने के रूप प्रदूषित किया जा रहा है । यथा-
- अंटार्कटिका क्षेत्र के कुछ हिस्से तेल के रिसाव के दबाव में अपनी गुणवत्ता खो रहे हैं
- समुद्री सतह में मछली और समुद्री जीवों के अतिशय दोहन, समुद्री तटों पर औद्योगिक प्रदूषण, भारी मात्रा में प्रदूषित जल को समुद्र में डालना तथा अत्यधिक मशीनीकरण के कारण समुद्रीय पर्यावरण की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है।
- औद्योगीकरण, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन, यातायात के साधनों के बढ़ने से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है।
प्रश्न 6. साझ परन्तु अलग-अलग जिम्मेदारियों’ से क्या अभिप्राय है? हम इस विचार को कैसे लागू कर सकते हैं?
उत्तर:- साझी तथा अलग-अलग जिम्मेदारियों से आशय – विश्व पर्यावरण की रक्षा के सम्बन्ध में साझी परन्तु अलग-अलग जिम्मेदारी से आशय यह है कि धरती के पर्यावरण की रक्षा के लिए सभी राष्ट्र आपस में सहयोग करेंगे। लेकिन पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राष्ट्रों का योगदान अलग-अलग है। इसे देखते हुए इसकी रक्षा में विभिन्न राष्ट्रों की अलग-अलग जिम्मेदारियाँ हैं। इसमें विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों की जिम्मेदारी अधिक है। ‘साझी परन्तु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ के सिद्धान्त को लागू करना – साझी समझ तथा अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धान्त को निम्न प्रकार से लागू किया जा सकता है।
- सभी देश विश्वबंधुत्व की भावना से आपस में सहयोग करें।
- विकसित देशों के समाजों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव ज्यादा है और इनके पास विपुल प्रौद्योगिकीय तथा वित्तीय साधन हैं। इसे देखते हुए ये देश टिकाऊ विकास के प्रयास में अपनी विशिष्ट जिम्मेदारी निभायें।
- सभी देश अपनी क्षमतानुसार पर्यावरण की सुरक्षा में अपनी जिम्मेदारी निभायें।
- विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है, इसलिए इन पर क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यताओं को लादा न जाए।
- विकासशील देश स्वेच्छा से इस ओर अपनी जिम्मेदारी उठाते जाएँ।
प्रश्न 7. वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे 1990 के दशक से विभिन्न देशों के प्राथमिक सरोकार क्यों बन गए हैं?
उत्तर: निम्नलिखित कारणों से वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे 1990 के दशक से विभिन्न देशों के प्राथमिक सरोकार बन गये हैं-
- खाद्य उत्पादन में कमी आना – दुनिया में जहाँ जनसंख्या बढ़ रही है, वहाँ कृषि योग्य भूमि में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। दूसरे, जलराशि की कमी तथा जलीय प्रदूषण, चरागाहों की समाप्ति, भूमि की उर्वरता की कमी के कारण खाद्यान्न उत्पादन जनसंख्या के अनुपात में कम हो रहा है।
- स्वच्छ जल की उपलब्धता में कमी आना – विकासशील देशों की एक अरब बीस करोड़ जनता को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होता और यहाँ इस वजह से 30 लाख से ज्यादा बच्चे हर साल मौत के शिकार हो रहे हैं।
- जैव-विविधता की हानि होना-वनों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, लोग विस्थापित हो रहे हैं तथा जैव- विविधता की हानि जारी है।
- ओजोन गैस की मात्रा में क्षय होना- धरती के ऊपरी वायुमंडल में ओजोन गैस की मात्रा में लगातार कमी हो रही है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र और मनुष्य के स्वास्थ्य पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
- समुद्रतटीय क्षेत्रों में प्रदूषण का बढ़ना- पूरे विश्व में समुद्रतटीय क्षेत्रों का प्रदूषण भी बढ़ रहा है। इससे समुद्री पर्यावरण की गुणवत्ता में भारी गिरावट आ रही है।
प्रश्न 8. पृथ्वी को बचाने के लिए जरूरी है कि विभिन्न देश सुलह और सहकार की नीति अपनाएँ पर्यावरण के सवाल पर उत्तरी और दक्षिणी देशों के बीच जारी वार्ताओं की रोशनी में इस कथन की पुष्टि करें।
उत्तर: 1980 के दशक से तेजी से बढ़ते वैश्विक पर्यावरणीय प्रदूषण के गंभीर खतरों को देखते हुए विश्व के अधिकांश देशों ने पृथ्वी को बचाने के लिए परस्पर सुलह और सहकार नीति अपनाने के लिए परस्पर बातचीत की। यद्यपि पृथ्वी को बचाने के लिए उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों ने अपनी वचनबद्धता दिखाई, लेकिन इनके बीच जो वार्ताएँ हुईं उनमें पर्यावरण के सवाल पर निम्न सहमतियाँ तथा असहमतियाँ उभरी हैं-
- रियो सम्मेलन में ‘ एजेंडा – 21’ के रूप में टिकाऊ विकास के तरीके पर दोनों में सहमति बनी, लेकिन यह समस्या बनी रही कि इस पर अमल कैसे किया जाएगा।
- ‘वैश्विक सम्पदा’ की सुरक्षा के प्रश्न पर सहयोग करने की दृष्टि से अंटार्कटिका संधि (1959), मांट्रियल न्यायाचार 1987 तथा अंटार्कटिका न्यायाचार 1991 हुए, लेकिन इनमें किसी सर्वसम्मत पर्यावरणीय एजेण्डा पर सहमति नहीं बन पायीं।
- क्योटो प्रोटोकॉल, 1997 में दोनों गोलार्द्ध के बीच मतभेद और बढ़ गये । जहाँ विकासशील देशों का कहना है कि विकसित देशों की भूमिका इस सम्बन्ध में अधिक होनी चाहिए क्योंकि प्रदूषण उनके द्वारा अधिक किया जा रहा है, वहीं विकसित देश समान जिम्मेदारी पर बल दे रहे हैं।
- इसके बाद हुए सम्मेलनों में भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में तुरंत कटौती की आवश्यकता पर तो सहमति बनी, पर यह समयबद्ध नहीं हो पायी।
प्रश्न 9. विभिन्न देशों के सामने सबसे गंभीर चुनौती वैश्विक पर्यावरण को आगे कोई नुकसान पहुँचाये बगैर आर्थिक विकास करने की है। यह कैसे हो सकता है? कुछ उदाहरणों के साथ समझायें।
उत्तर: वर्तमान परिस्थितियों में विभिन्न देशों के सामने सबसे गंभीर चुनौती पर्यावरण को आगे कोई नुकसान पहुँच ये बगैर आर्थिक विकास करने की है। यह निम्न प्रकार से संभव हो सकता है-
- विकसित देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर में निरन्तर कमी लाने की एक समयबद्ध तथा बाध्यतामूलक न्यायाचार का पालन करें।
- विकासशील देशों में आर्थिक विकास जारी रह सके और पर्यावरण प्रदूषण न बढ़े इसके लिए विकसित देशों को स्वच्छ विकास यांत्रिकी परियोजनाओं को चलाने के लिए पूँजी निवेश करना चाहिए तथा विकासशील देशों को इसके लिए ऋण सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए ।
- सभी देश ऊर्जा का और अधिक कुशलता के साथ प्रयोग करें तथा ऊर्जा के असमाप्य संसाधनों, जैसे – सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा का विकास करें।
- पानी को दूषित करने वाले लोगों व उद्योगों पर जुर्माना लगायें।
- उद्योगों से सुरक्षापूर्ण व सफाई युक्त उत्पादन की विधियों को अपनायें।
- कूड़े-कचरे के प्रबंध के लिए राष्ट्रीय योजना तैयार करें तथा कूड़े-कचरे की खपत के प्रारूपों को बदलें।
- पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को रोकें तथा वृक्षारोपण को एक राष्ट्रीय अभियान बनाएँ।
- वर्षा के पानी को संरक्षित करें।