अध्याय 8 सामाजिक आंदोलन
सामाजिक आन्दोलन :-
ये समाज को एक आकार देते है । 19वीं सदी में कुछ सुधार आन्दोलन हुए जैसे-जाति व्यवस्था के विरूद्ध, लिंग आधारित, भेदभाव के विरूद्ध राष्ट्रीय आज़ादी की आन्दोलन आदि ।
सामाजिक आन्दोलन के लक्षण :-
लम्बे समय तक निरंतर सामुहिक गतिविधियों की आवश्यकता । सामाजिक आन्दोलन प्रायः किसी जनहित के मामले में परिवर्तन के लिए होते हैं। जैसे आदिवासिओं का जंगल पर अधिकार, विस्थापित लोगों का पुनर्वास । सामाजिक परिवर्तन लाने को लिए । सामाजिक आन्दोलन के विरोध में प्रतिरोधी अन्दोलन जन्म लेते हैं, जैसे सती प्रथा के विरूद्ध आन्दोलन के खिलाफ धर्म सभा बनी; जिसने अंग्रजो से सती प्रथा खत्म करने के विरूद्ध कानून न बनाने की मांग की ।
सामाजिक आन्दोलन विरोध के विभिन्न साधन विकसित करते है-मोमबत्ती या मशाल जुलूस, नुक्कड़ नाटक, गीत।
सामाजिक आन्दोलन के सिद्धांत :-
सापेक्षिक वचन का सिद्धान्त :-
सामाजिक संघर्ष तब उत्पन्न होता है जब सामाजिक समूह अपनी स्थिति खराब समझता है । मनोवैज्ञानिक कारण जैसे क्षोभ व रोष ।
सापेक्षिक वंचन के सिद्धांत की सीमाएं :- सामुहिक गतिविधि के लिए वंचन का आभास आवश्यक है लेकिन एक प्रर्याप्त कारण नहीं है ।
दि लोजिक ऑफ कलैक्टिव एक्शन:-
सामाजिक आन्दोलन में स्वयं का हित चाहने वाले विवेकी व्यक्तिगत अभिनेताओं का पुर्ण योग है । व्यक्ति कुछ प्राप्त करने लिए इनमे शामिल होगा उसे इसमें जोखिम भी कम हो और लाभ अधिक ।
सीमाएं :- सामाजिक आन्दोलन की सफलता संसाधनों व योग्यताओं पर निर्भर करती है ।
संसाधन गतिशीलता का सिद्धांत :-
सामाजिक आन्दोलन नेतृत्व, संगठनात्मक क्षमता तथा संचार सुविधाओं का एकत्र करना इसकी सफलता का जरिया है।
सीमाएं :- प्राप्त संसाधनों की सीमा में वंचित नहीं, नए
प्रतीक व पहचान की रचना भी कर सकती हैं ।
सामाजिक आंदोलनों के प्रकार :-
प्रतिदानात्मक आन्दोलन :- व्यक्तियों की चेतना तथा गतिविधियों में परिवर्तन लाते है । जैसे केरल के इजहावा समुदाय के लोगो ने नारायण गुरू के नेतृत्व मे अपनी सामाजिक प्रथाओं को बदला ।
सुधारवादी आन्दोलन :- सामाजिक तथा राजनीतिक विन्यास को धीमे व प्रगतिशील चरणों द्वारा बदलना । जैसे- 1960 के दशक में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन व सूचना का अधिकार ।
क्रांन्ति आन्दोलन :- सामाजिक सम्बन्धों में आमूल परिवर्तन करना तथा राजसत्ता पर अधिकार करना । जैसे- बोल्शेविक क्रान्ति जिसमें रूस में जार को अपदस्थ किया ।
सामाजिक अन्दोलन के अन्य प्रकार :-
पुराना सामाजिक आन्दोलन (आजादी पूर्व)- नारी आन्दोलन, सती प्रथा के विरूद्ध आन्दोलन, बाल विवाह, जाति प्रथा के विरूद्ध । राजनीतिक दायरे में होते थे । नया सामाजिक आन्दोलन – जीवन स्तर को बदलने व शुद्ध पर्यावरण के लिए । बिना राजनीतिक दायरे के होते हैं तथा राज्य धर दबाव ड़ालते है । अन्तर्राष्ट्रीय है ।
पारिस्थितिकीय अन्दोलन :-
उदाहरण:- चिपको आन्दोलन उत्तरांचल में वनों को काटने से रोकने तथा पर्यावरण का बचाव करने के लिए स्त्रियाँ पेड़ों से चिपक गई तथा पेड़ काटने नहीं दिये । इस प्रकार यह आन्दोलन आर्थिक, पारिस्थितिकीय व राजनीतिक बन गया ।
वर्ग आधारित आन्दोलन :-
किसान आन्दोलन :- 1858-1914 के बीच स्थानीयता, विभाजन व विभिन्न शिकायतों से सीमित होने की ओर प्रवृत हुआ ।
- 1859-62 मील की खेती के विरोद्ध में
- 1857 – दक्षिण का विद्रोह जो साहुकारो के विरोद्ध में
- 1928 – लगान विरोद्ध बारदोली, सूरत में
- 1920 – ब्रिटिश सरकार की वन नीतियों के विरुद्ध
- 1920 1940- अल इंडिया किसान सभा
स्वतंत्रता के समय दो मुख्य किसान आंदोलन हुए :-
1946 – 1947 तिभागा आन्दोलन :- यह संघर्ष पट्टेदारी के लिए हुआ ।
1946 – 1951 तेलंगाना आन्दोलन :- यह हैदराबाद की सांमती दशाओं के विरुद्ध था ।
स्वतंत्रा के बाद दो बड़े सामाजिक आंदोलन हुए :-
1967 नक्सली आन्दोलन :- यह आंदोलन भूमि को लेकर हुआ था ।
नया किसान आन्दोलन :-
- 1970 में पंजाब व तमिलनाडु में प्रारंभ हुआ ।
- दल रहित थे।
- क्षेत्रीय आधार पर संगठित थे ।
- कृषक के स्थान पर किसान जुड़े थे (किसान उन्हें कहा जाता है जो कि वस्तुओं के उत्पादन और खरीद दोनों में बाजार से जुड़े होते है । )
- राज्य विरोधी व नगर विरोधी थे ।
- लाभ प्रद कीमतें, कृषि निवेश की कीमते, टैक्स व उधार की वापसी की माँगे थी ।
- सड़क व रेल मार्ग को बंद किया गया था ।
- महिला मुद्दों को शामिल किया गया ।
कामगारों का अन्दोलन :-
1860 में कारखानो में उत्पादन का कार्य शुरू हुआ।कच्चा माल भारत से ले जाकर इंग्लैड में निर्माण किया जाता था ।
- बाद में ऐसे कारखानों को मद्रास, बंबई और कलकत्ता स्थापित किया गया ।
- कामगारों ने अपनी कार्य दशाओं के लिए विरोध किया।
- 1918 मे शुरूआत सर्वप्रथम मजदूर संघ की स्थापना हुई|
- 1920 में एटक की स्थापना हुई (ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस-एटक )
- कार्य के घंटों की अवधि को घटाकर 10 घंटे कर दिया
गया । - 1926 में मजदूर संघ अधिनियम पारित हुआ जिसने मज़दूर संघों के पंजीकरण कि प्रावधान किया, और कुछ नियम बनाए ।
जाति अधारित अन्दोलन :-
दलित आन्दोलन :- दलित शब्द मराठी, हिन्दी, गुजराती व अन्य भाषाओं के रूप में पहचान प्राप्त करने का संघर्ष है। दलित समानता, आत्मसम्मान, अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए संघर्ष कर रहे हैं ।
- मध्यप्रदेश में चमारों का सतनामी आन्दोलन
- पंजाब में अदिधर्म आन्दोलन
- महाराष्ट्र में महार आन्दोलन
- आगरा में जाटवों की गतिशीलता
- दक्षिण भारत में ब्राह्मण विरोधी अन्दोलन
पिछड़े वर्ग का आन्दोलन :-
- पिछड़े जातियों, वर्गों का राजनीतिक इकाई के रूप मे उदय ।
- औपनिवेशिक काल में राज्य अपनी संरक्षित का वितरण जाति अधारित करते थे ।
- लोग सामाजिक तथा राजनीतिक पहचान के लिए जाति में रहते है ।
- आधुनिक काल में जाति अपनी कर्मकांडो विषय वस्तु छोड़ने लगी तथा राजनीतिक गतिशीलता के पंथनिरपेक्ष हो गई है ।
उच्चजाति का आन्दोलन :- दलित व पिछडो के बढ़ते प्रभाव से उच्च जातियों ने उपेक्षित महसूस किया ।
जन जातीय अन्दोलन :-
जनजातीय आंदोलनों में से कई मध्य भारत में स्थित है ।जैसे छोटे नागपुर व संथाल परगना में स्थित संथाल, हो, मुंडा, ओराव, मीणा आदि ।
झारखन्ड :-
- बिहार से अलग होकर 2000 में झारखन्ड राज्य बना ।
- आन्दोलन की शुरूआत विरसा मुण्डाने की थी ।
- ईसाई मिशनरी ने सक्षरता का अभियान चलाया ।
- दिक्कुओं – ( व्यापारी व महाजन) के प्रति घृणा ।
- आदिवासीयों का अलग थलग किया जाना ।
पूर्वीतर राज्यों के आन्दोलन :- वन भूमि से लोगों का विस्थापन तथा पारिस्थितिकीय मुद्दे ।
महिलाओं का अन्दोलन :-
- 1970 के दशक में भारत में महिला आन्दोलन का नवीनीकरण हुआ ।
- महिला आन्दोलन स्वायत थे तथा राजनीतिक दलो से स्वतन्त्र थे ।
- महिलाओं के प्रति हिंसा के बारे मे अभियान चलाए ।
- स्कूल के प्रार्थना पत्र में माता पिता दोनो के नाम शामिल ।
- यौन उत्पीड़न व दहेज के विरोध मे ।
- कुछ महिला संगठनों के नाम – विन्स इंडिया एसोसिएशन (1971), ऑल इंडिया विमंश कांफ्रेंस (1926)