अध्याय 18 निर्माण उद्योग
औद्योगिक प्रदेश :-
किसी निर्धारित क्षेत्र में उद्योगों का संकेन्द्रण होना श्रमिकों का अधिक होना, औद्योगिक कार्यों में ऊर्जा की खपत अधिक होना और उत्पाद का मूल्य अधिक होना, किसी प्रदेश को औद्योगिक प्रदेश का दर्जा देते हैं ।
विनिर्माण उद्योग :-
कच्चे माल को मशीनों की सहायता से, रूप बदल कर अधिक उपयोगी तैयार माल प्राप्त करने की क्रिया को विनिर्माण उद्योग कहते हैं । इसमें वस्तु का रूप तो बदल ही जाता है, साथ ही वह अधिक उपयोगी भी हो जाती है और निर्माण द्वारा उस पदार्थ की मूल्य वृद्धि भी हो जाती है । कपास से धागा व कपड़ा बनने से कपास के मूल्य में वृद्धि हो जाती है ।
उद्योगों के प्रकार :-
विभिन्न आधारों पर विनिर्माण उद्योगों का वर्गीकरण :-
स्वामित्व के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण :-
i) सार्वजनिक क्षेत्र
ii ) निजी क्षेत्र
iii ) मिश्रित क्षेत्र
iv ) सहकारी क्षेत्र
उत्पाद के उपयोग के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण :-
i ) आधारभूत उद्योग
ii) उपभोक्ता उद्योग
iii ) पूँजी वस्तु उद्योग
iv ) अर्धनिर्मित वस्तु उद्योग
कच्चे माल के स्रोत के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण :-
i ) कृषि आधारित
ii) खनिज आधारित
iii ) वन आधारित
iv ) पशु आधारित
निर्मित वस्तुओं के स्वरूप के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण :-
i ) धातु आधारित
ii ) यंत्रिक इन्जीनियरिंग
iii) रसायन आधारित
iv ) वस्त्र उद्योग
v) खाद्य प्रसंस्करण
vi ) विद्युत निर्माण
vii ) इलेक्ट्रॉनिक
viii) संचार उद्योग
भारत में किसी प्रदेश के उद्योगों की स्थिति को
प्रभावित करने वाले कारक :-
1) कच्चे माल की उपलब्धता :- सामान्यता उद्योग वहीं स्थापित होते है जहाँ कच्चा माल उपलब्ध होता है । जिन उद्योगों में निर्मित वस्तुओं का भार कच्चे माल के समीप लगाए जाते हैं ।
2 ) शक्ति के साधन :- किसी भी उद्योग की स्थापना से पहले उसकी शक्ति की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली जाती है ।
एल्युमिनियम उद्योग शक्ति के साधन के नजदीक लगाए जाते हैं क्योंकि इसमें बिजली का बहुत अधिक उपयोग किया जाता है।
3 ) परिवहन :- कच्चे माल को उद्योग केन्द्र तक लाने तथा निर्मित माल को बाजार तक ले जाने के लिए सस्ते तथा कुशल यातायात का प्रचुर मात्रा में होना आवश्यक हैं।
4 ) बाजार :- उद्योगों का सारा विकास निर्मित माल की खपत के बाजर पर निर्भर करता है। बाजार की निकटता से उपभोक्ता को औद्योगिक उत्पाद सस्ते दाम पर मिल जाते हैं|
5 ) श्रम :- सस्ते तथा कुशल श्रम की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता औद्योगिक विकास का मुख्य कारण है । कुछ उद्योग तो श्रम प्रधान ही होते हैं। इन्हें विशेष दक्षता वाले श्रमिकों की आवश्यकता होती हैं जैसे फिरोजाबाद का चूड़ी उद्योग श्रम प्रधान उद्योग है ।
6 ) ऐतिहासिक कारक :- मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे केन्द्रों का औपनिवेशिक काल में ही विकास हो गया था मुर्शिदाबाद, भदोही, सूरत, बड़ौदा, प्राचीन समय से ही औद्योगिक केन्द्र के रूप में उभर आये थे ।
मुख्य उद्योग :
किसी भी देश के औद्योगिक विकास के लिए लौह इस्पात उद्योग एक मूल आधार होता है। सूती वस्त्र उद्योग हमारे परंपरागत उद्योगों में से एक है। चीनी उद्योग स्थानिक कच्चे माल पर आधारित है जो कि अंग्रेजों के समय में भी फला फूला । तथा पेट्रोलियम रासायनिक उद्योग ( Petrochemical Industry ) और अवगम प्रौद्योगिकी उद्योग ( IT Industry ) भी एक मुख्य उद्योग है।
लौह इस्पात उद्योग :-
लौह इस्पात उद्योग के विकास ने भारत में तीव्र औद्योगिक विकास के दरवाजे खोल दिए । भारतीय उद्योग के सभी सेक्टर अपनी मूल आधारिक अवसंरचना के लिए मुख्य रूप से लोहा इस्पात उद्योग पर निर्भर करते हैं ।
लौह इस्पात उद्योग के लिए लौह अयस्क और कोककारी कोयला के अतिरिक्त चूनापथर, डोलोमाईट, मैगनीज आदि कच्चे माल की आवश्यकता होती है ।
ये सभी कच्चे माल भार ह्रास वाले होते हैं, इसलिए लोहा – इस्पात उद्योग की सबसे अच्छी स्थिति कच्चे माल के स्त्रोतों के निकट होती है ।
भारत में छत्तीसगढ़, उत्तरी ओड़िसा, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल के भाग उच्च कोटि के लौह अयस्क, अच्छी गुणवत्ता वाले कोककारी कोयले और अन्य खनिजों में समृद्ध हैं ।
भारत के प्रमुख इस्पात कारखाने :-
- टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी ( TISCO)
- इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी ( IISCO)
- विश्वेश्वरैया आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (VISW )
- राउरकेला स्टील प्लाण्ट
- भिलाई स्टील प्लाण्ट
- दुर्गापुर स्टील प्लाण्ट
- बोकारो स्टील प्लाण्ट
- विजयनगर स्टील प्लाण्ट
- विजाग स्टील प्लाण्ट, एवं
- सेलम स्टीम प्लाण्ट
सूती वस्त्र उद्योग :-
प्रारंभ में अंग्रेजों ने स्वदेशी सूती वस्त्र उद्योग के विकास को प्रोत्साहित नहीं किया, वे कच्चे कपास को मेनचेस्टर और लिवरपूल स्थित अपनी मीलों के लिए निर्यात कर देते थे और फिर तैयार माल को बेचने के लिए भारत ले आते थे ।
1854 में पहली आधुनिक सूती मील की स्थापना मुंबई में की गयी, इस शहर को बहुत लाभ थे क्योकि यह गुजरात और महाराष्ट्र के कपास उत्पादक क्षेत्रों के बहुत निकट था ।
रोजगार अवसर प्रदान करने वाला बड़ा नगर होने के कारण यह श्रमिकों के लिए एक आकर्षण का केंद्र था इसलिए सस्ते और प्रचुर मात्रा में श्रमिक भी आसपास ही मिल जाते थे ।
1947 तक भारत में मीलों की संख्या 423 तक पहुँच गयी लेकिन देश के विभाजन के बाद दृश्य बदल गया और इस उद्योग को एक बड़ा घाटा झेलना पड़ा, क्योकि अच्छी गुणवत्ता वाले कपास उत्पादक क्षेत्र में से अधिकांश पश्चिमी पाकिस्तान में चले गए और भारत में 409 मील और 29% कपास उत्पादक क्षेत्र रह गए ।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस उद्योग में धीरे धीरे पुनर्लाभ की स्थिति आई और अंत में यह उद्योग फिर से विकसित हो गया ।
सूती वस्त्र उद्योग का वितरण :-
वितरण – सर्वप्रथम मुंबई एवं अहमदाबाद में सूती वस्त्र उद्योग का विकास हुआ । तत्पश्चात द. भारत में कोयम्बटूर, मदुरै और बैंगलोर में यह उद्योग फैला । इसके अतिरिक्त नागपुर, इंदौर, शोलापुर, कानपुर, वड़ोदरा आदि केन्द्र बने । आज तमिलनाडु में सबसे अधिक मिले हैं ।
सूती वस्त्र उद्योग के विस्तार के प्रमुख कारण :-
- सस्ते स्थानिक श्रम |
- विद्युत शक्ति की उपलब्धता ।
- कच्चा माल एवं उत्पादित माल हल्का होने के कारण यह बाज़ार केन्द्रित उद्योग है अर्थात् कच्चे माल (कपास) के स्रोत के पास नहीं वरन् बाज़ार के पास उद्योगों का होना ।
- परिवहन सुविधा का विकास ।
सूती वस्त्र उद्योग के सेक्टरों के नाम :-
दो सेक्टर हैं:-
हथकरघा सैक्टर:- सैक्टर स्थानिक श्रम तथा कच्चे माल पर निर्भर करता है तथा इसका उत्पादन भी सीमित है।
विद्युत करघा सेक्टर :- विद्युत करघा सेक्टर में कपड़ा मशीनों द्वारा उत्पादित किया जाता है यह सेक्टर देश के कुल उत्पादन का 50 प्रतिशत भाग उत्पादित करता है ।
भारत में सूती वस्त्र उद्योग की समस्याएं::-
देश में लम्बे रेशेवाली कपास का उत्पादन कम है अतः इसे विदेशों से आयात करना पड़ता है ।
सूती कपड़ा मिलों की मशीनरी पुरानी है अतः इसे विदेशों से आयात करना पड़ता है ।
मशीनरी के आधुनिकीकरण के लिए स्वचालित मशीनें लगाना आवश्यक है जिसके लिए पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता है ।
देश में हथकरघा उद्योग में प्रतिस्पर्धा है ।
विदेशों में भी चीन व जापान के तैयार वस्त्रों से अधिक स्पर्धा करनी पड़ रही है ।
चीनी उद्योग :-
विश्व में भारत चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है ।भारत गुड़ और खांडसारी का सबसे बड़ा उत्पादक है ।भारत में 460 से अधिक चीनी मिलें हैं; जो उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश में फैली हुई हैं। साठ प्रतिशत मिलें उत्तर प्रदेश और बिहार में हैं और बाकी अन्य राज्यों में हैं। मौसमी होने के कारण यह उद्योग को- ऑपरेटिव सेक्टर के लिये अधिक उपयुक्त है।
हाल के वर्षों में चीनी उद्योग दक्षिण की ओर शिफ्ट कर रहा है। ऐसा विशेष रूप से महाराष्ट्र में हो रहा है। इस क्षेत्र में पैदा होने वाले गन्ने में शर्करा की मात्रा अधिक होती है ।
इस क्षेत्र की ठंडी जलवायु से गन्ने की पेराई के लिये अधिक समय मिल जाता है ।
चीनी उद्योग एक मौसमी उद्योग क्यों है ?
गन्ना अगर खेत से काटने के 24 घंटे के अंदर ही पेरा जाए ( रस निकालना ) तो अधिक चीनी की मात्रा प्राप्त होती है । शुष्क ऋतु में गन्ने को खेत में नहीं रखा जा सकता । सूखने पर चीनी की मात्रा कम हो जाती है । इसलिए इसे काट कर फौरन मिलों तक भेजा जाना ज़रूरी है । मिले केवल उस मौसम में कार्य करती है जब उसे काटा जाता है ।
गन्ने की पिराई का काम वर्ष भर नहीं होता केवल 4 से 6 महीने तक ही मिल चल पाती हैं ।
पेट्रो-रसायन उद्योग :-
यह उद्योग भारत में तेजी से विकसित हो रहे हैं, इन उद्योगों की इस श्रेणी में कई प्रकार के उत्पाद आते हैं । 1960 में जैव रसायनों की मांग इतनी तेजी से बढ़ी की उसको पूरा करना कठिन हो गया, उस समय पेट्रोल परिशोधन उद्योग का तेजी से विस्तार हुआ।
पटाखों के उद्योग उत्तरप्रदेश ( औरेया), जामनगर, गांधीनगर, रत्नागिरी और विशाखापटनम में स्थित हैं ।
सार्वजानिक सेक्टर में 1961 में स्थापित द नेशनल आर्गेनिक केमिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड मुंबई का पहला रासायनिक उद्योग था ।
संश्लिष्ट तन्तु ( synthetic fibre ) का अपने मजबूती, टिकाउपन, धोने पर न सुकड़ने के गुणों के कारण इसका व्यापक रूप से प्रयोग कपडा बनाने के लिए किया जाता है ।
नायलोन तथा पोलिस्टर धागा बनाने के संयंत्र कोटा, पिंपरी, मुंबई, मोदीनगर, पुणे, उज्जैन, नागपुर में लगाये गए हैं ।
रासायनिक व पैट्रोरासायनिक विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य कर रही संस्थायें :-
भारतीय पैट्रोरासायनिक कार्पोरेशन लिमिटेड (IPCL) सार्वजनिक सैक्टर में है। यह विभिन्न प्रकार के पैट्रोरसायन जैसे – पॉलीमर, रेशों और देशों से बने संक्रियक ( Intermediate ) का निर्माण और वितरण करता है ।
पैट्रो फितस कोऑपरेटिव लिमिटेड – यह भारत सरकार एवं संस्थानों का संयुक्त प्रयास है । यह पॉलिस्टर तन्तु, सूत और नाइलोन चिप्स का उत्पादन गुजरात स्थित बड़ोदरा एवं नलधारी संयन्त्रों में करता है ।
सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नालाजी ( CIPET ) है जो पैट्रोकेमिकल उद्योग में प्रशिक्षण प्रदान करता है ।
पैट्रोकेमिकल उद्योग :
भूगर्भ से निकले खनिज तेल के परिशोधन के फलस्वरूप कई प्रकार के उत्पादन प्राप्त होते हैं। उसी को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करके कई प्रकार की वस्तुएँ बनती हैं । इसे ही पेट्रोकेमिकल उद्योग कहते हैं । प्लास्टिक उद्योग, सिन्थेटिक वस्त्र उद्योग, उर्वरक आदि पेट्रोकेमिकल उद्योग के उदाहरण है।
ज्ञान आधारित उद्योग :-
अति उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति, वैज्ञानिक इंजीनियर आदि उत्पादन कार्य में विशिष्ट ज्ञान का उपयोग करते हैं । तो इसे ज्ञान आधारित उद्योग कहते है ।
भारी उद्योग :-
खनिज पदार्थों का उपयोग करने वाले आधारभूत उद्योगों को भारी उद्योग कहते हैं। इन उद्योगों में लगने वाला कच्चा माल भी भारी होता है तथा उत्पाद भी । ये उद्योग किसी भी देश के औद्योगिकरण की आधारशिला है । जैसे – लोहा इस्पात उद्योग, मशीनरी उद्योग, इंजीनियरिंग समान बनाने के उद्योग भारी उद्योगों में गिने जाते हैं ।
नई औद्योगिक नीति :-
नई औद्योगिक नीति की घोषणा 1991 में की गई ।
नई औधोगिक नीति के प्रमुख उद्देश्य :-
- अब तक प्राप्त किए गए लाभ को बढ़ाना ।
- पुरानी औद्योगिक नीति की कमियों को दूर करना ।
- उत्पादकता और लाभकारी रोजगार में स्वपोषित वृद्धि को बनाए रखना है।
- अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता प्राप्त करना है ।
भारत की नई औद्योगिक नीति (1991) में किए गए छ : उपायों :-
- औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था का समापन
- विदेशी तकनीकी का निःशुल्क प्रवेश
- विदेशी निवेश नीति
- पूंजी बाजार की सुलभता
- खुला बाजार
- औद्योगिक अवस्थिति कार्यक्रम का उदारीकरण – इस नीति में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण शामिल है।
उदारीकरण:-
उदारीकरण से अभिप्राय है निजी क्षेत्र से सभी प्रकार के प्रतिबंधों को हटाना ताकि वह क्षेत्र अधिक प्रतिस्पर्धा के योग्य बन सके ।
निजीकरण :-
निजी क्षेत्र में अधिक से अधिक उद्योगों को सम्मिलित करना । सरकार का प्रभुत्व समाप्त करना तथा नए क्षेत्र जैसे खनन, दूरसंचार, मार्ग निर्माण और व्यवस्था को व्यक्तिगत कंपनियों के लिए खोलना ।
वैश्वीकरण :-
इसके द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को संसार की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना है । इस प्रक्रिया के अंतर्गत सामान पूँजी सहित सेवाएँ, श्रम और संसाधन एक देश से दूसरे देश को स्वतंत्रतापूर्वक पहुँचाए जा सकते हैं ।
उदारीकरण की मुख्य विशेषताएँ :-
- औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था को समाप्त करना ।
- विदेशी टेक्नोलॉजी का भारत में प्रयोग में स्वतंत्रता ।
- विदेशी निवेश का उदारीकरण ।
- खुला व्यापार ।
उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण ने भारत के औद्योगिक विकास में किस प्रकार से सहायता की है :-
विदेशी सहयोग में वृद्धि हुई है। विदेशी निवेश का बड़ा भाग घरेलू उपकरणों, वित्त सेवा, इलेक्ट्रानिक और विद्युत उपकरण तथा खाद्य व दुग्ध उत्पादकों में लगाया जा चुका है ।
प्रतिस्पर्धा के परिणामस्वरूप कुछ भारतीय कंपनियों को भी लाभ हुआ है, उनको नई तकनीक में निवेश का अवसर प्राप्त हुआ । इसके फलस्वरूप यह कंपनियाँ अपने उत्पादन में वृद्धि करने में सफल रही ।
टाटा मोटर, इन्फासिस जैसी कम्पनियों ने विश्वभर में अपनी शाखायें खोली है ।
छोटे उत्पादकों पर वैश्वीकरण का बुरा प्रभाव पड़ा । वे बड़ी कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकी ।
मुम्बई- पुणे औद्योगिक प्रदेश की प्रमुख विशेषताएं :-
यह प्रदेश मुम्बई : – थाणे से पुणा तथा नासिक और शोलापुर जिलों के समीपवर्ती क्षेत्रों तक विस्तृत है । इस प्रदेश का विकास मुंबई में सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना के साथ प्रारम्भ हुआ ।
मुम्बई हाई पैट्रोलियम क्षेत्र और नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र की स्थापना से इस प्रदेश का औद्योगिक तीव्र गति से हुआ ।
यहाँ अभियान्त्रिकी वस्तुएँ, पैट्रोलियम, परिशोधन पैट्रो – रसायन, चमड़ा, प्लास्टिक वस्तुएँ, दवाएँ, उर्वरक, विद्युत वस्तुएँ, जलयान, निर्माण, सॉफ्टवेयर इत्यादि उद्योगों का विकास हुआ है ।
इस प्रदेश में मुम्बई, थाणे. ट्राम्बे, पूना, नासिक, मनमाड़, शोलापुर, कोल्हापुर, सतारा तथा सांगली महत्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्र है ।
गुजरात औद्योगिक प्रदेश की प्रमुख विशेषताएं :-
यह प्रदेश अहमदाबाद एवं बड़ोदरा के बीच स्थित है । यह प्रदेश दक्षिण में बलसाद और सूरत तक या पश्चिम में जामनगर तक फैला ।
यह प्रदेश की सूती वस्त्र उद्योग का महत्वपूर्ण केन्द्र है । सूती वस्त्र उद्योग के अतिरिक्त पैट्रों, रसायनिक उद्योग, इंजीनियरिंग उद्योग, चीनी उद्योग एवं दवाई उद्योग यहाँ के प्रमुख उद्योग है ।
इस प्रदेश को कपास उत्पादक क्षेत्र में स्थित होने के कारण कच्चे माल और बाजार दोनों का ही लाभ प्राप्त है।
इस प्रदेश के महत्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्र अहमदाबाद, बडोदरा, भरूच कोयली, सूरत बलसाद तथा जामनगर आदि हैं ।
काँधला बन्दरगाह ने इस औद्योगिक प्रदेश के विकास में तेजी लाने में योगदान किया ।
कोयली तेल शोधनशाला के कारण पेट्रो- केमिकल उद्योग स्थापित हुये ।