भीष्म साहनी
(जीवन परिचय)
लेखक परिचय : भीष्म साहनी
जन्म / स्थान : सन् 1915, रावलपिंडी।
शिक्षा : प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से अंग्रेजी साहित्य
एम.ए, पंजाब विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
कार्य : अध्यापन कार्य – दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज में, खालसा कॉलेज अमृतसर में अध्यापन कार्य किया
अनुवादक : विदेशी भाषा प्रकाशन गृह मास्को में अनुवादक के पद पर कार्यरत रहे वहाँ रूसी पुस्तकों का अनुवाद किया।
संपादन:- नयी कहानियाँ का संपादन किया प्रगतिशील लेखक तथा अफ्रो-एशियाई
लेखक संघ से संबद्ध रहे।
रचनाएँ : कहानी संग्रह : भाग्यरेखा, पहला पाठ, भटकती राख, पटरियाँ, शोभा यात्रा,
निशाचर, पाली, डायन, वाडनू
उपन्यास : झरोखे, कडियाँ, तमस, वसंती, कुतो, नीलू, नीलिमा, नीलोफर।
नाटक : माधवी, कबीरा खड़ा बाजार में, मुआवजे, हानूश।
बाल कहानी : गुलेल का खेल।
धारावाहिक लेखन : बूँद बूँद
‘
पुरस्कार :- ‘तमस’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार। हिन्दी में साहित्यिक अवदान के लिए श्लाका सम्मान प्राप्त किया।
साहित्यिक विशेषताएँ : आम आदमी की संवेदनशीलता को और आम आदमी के
चरित्र को उकेरा है। समाज के यथार्थ को चित्रित किया है।
भाषाशैली:- छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग, संवादों का प्रयोग वर्णन में ताजगी ला देता
है। भाषा में उर्दू और पंजाबी शब्दों की सौंधी महक भी है।
मृत्यु : सन् 2003
( प्रश्न – उत्तर. )
प्रश्न 1: रोगी बालक के प्रति गांधी जी का व्यवहार उनके व्यक्तित्व की किस खूबी को दर्शाता है?
उत्तर : गांधी जी बहुत ही दयालु और सहदय व्यक्ति थे। रोगियों की सेवा करना वो
अपना धर्म समझते थे। बालक के पेट में जब दर्द असहनीय हो गया तो वह सिर्फ बापू को
ही बुलाने की बात कर रहा था। बापू के स्नेह और सेवा से वह ठीक हो गया। गांधी जी
रोगियों की मनस्थिति को भांपकर उनसे प्रेम का व्यवहार करते थे। जिन रोगियों के पास
लोग जाने से कतराते थे जैसे तपेदिक का रोगी. वे स्वयं उनके पास जाते और देखभाल करते थे। इन उदाहरणों से गांधी जी के उच्च व्यक्तित्व का परिचय मिलता है।
प्रश्न 2. फिलीस्तीन के प्रति भारत का रवैया बहुत ही सहानुभूति पूर्ण एवं समर्थन भरा
क्यों था?
उत्तर: साम्राज्यवादी शक्तियाँ कई देशों पर अन्याय कर रही थी और उन्हें अपने में
मिलाना चाहती थीं। भारत स्वयं फिलीस्तीन की तरह साम्राज्यवादी शक्तियों के अन्याय का शिकार था। इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वालों के साथ वह सहानुभूति रखता था। भारतवासी फिलीस्तीन के लोगों को सही मानते थे तथा उन्हें भी आन्दोलन के लिए समर्थन देना चाहते थे। इसी संघर्ष में यास्सेर अराफात ने गांधी जी को अपना आदर्श माना हुआ था।