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class 12 antra chapter 4 notes hindi

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(क) बनारस
इस शहर में………बिल्कुल बेखबर ।
मूल भाव :-
केदारनाथ सिंह की कविता ‘बनारस’ में प्राचीनता, आध्यात्मिकता एवं भव्यता के साथ-साथ आधुनिकता का अपूर्व समन्वय है। कविता बसंत आने पर धर्मिक, सांस्कृतिक वैभव, आयोजनों एवं मिथकीय आस्थाओं का परंपराबोध् कराती है।
व्याख्या बिन्दु- बनारस एक बहुत प्राचीन शहर है। पौराणिक ग्रंथों एवं दंतकथाओं मे बनारस को काशी नाम से संबोधित किया जाता है। कवि कहता है कि बनारस में बसंत का आगमन अचानक होता है। बसंत के आगमन पर लहरतारा या मडुवाडीह मोहल्लों में धूल का एक बवंडर उठता है, जिससे इस महान एवं पुराने बनारस शहर की जीभ किरकिराने लगती है। बसंत का प्रभाव दशाश्वमेध् घाट के पत्थरों पर भी दिखाई देने लगता है। बसंत के आगमन और लोगों के स्नान ध्यान, पूजा-अर्चना से घाट का अंतिम पत्थर भी अपनी कठोरता छोड़ कर नरम हो जाता है। सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखो में नमी तथा भिखारियों निराश आँखो में उत्साह एवं उनके खाली कटोरों में सिक्कों की चमक दिखाई देने लगती है। घाट पर आये श्रद्धालु भिखारियों के खाली कटोरों को दानस्वरूप कुछ न कुछ देकर भर देते है। इस तरह इन कटोरों में बसंत उतरता है।

इस शहर के साथ एक मिथकीय आस्था जुड़ी हुई है कि एवं गंगा का सानिध्य पाकर मानव को जीवन मृत्यु के चक्र से छुटकारा मिल जाता है, अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इसलिए प्रतिदिन असंख्य शवों को अपने कंधे पर लादकर लोग बनारस की तंग गलियों से गंगा के किनारे दाह-संस्कार के लिए ले जाते है।
बनारस तीव्र गति वाला शहर नही हैं, यहाँ सभी कुछ धीमी गति से संपन्न होता है। यहाँ के निवासियों के स्वभाव में भागमभाग नही है। धीरे कार्य करने की विशेषता ने सारे समाज को एकता के सूत्रा में मजबूती से बाँध रखा है। घाट पर बँधी नाव और तुलसीदास की चरण-पादुकाओं के द्वारा यह स्पष्ट किया गया है। यहाँ जो परंपराएं, आस्थाएं विश्वास, भक्ति और श्रद्धा है उनमें सैकड़ो वर्षों से कुछ भी परिवर्तन नही हुआ है। परंपरागत जीवन वैसा ही चल रहा है, जैसे चलता आया है। बनारस एक अद्भुत शहर है। इस की रिक्तता और पूर्णता दर्शाने के लिए कवि कहता है कि यह आध फूल में, आध शव में आध नींद में आध शंख में है। आध होना और आध न होना इस शहर का रहस्य है। राख, रोशनी, आग, पानी, धुएँ, खुशबू और आदमी के उठे हाथों के स्तंभो के द्वारा कवि कहना चाहता है कि यह शहर आस्था के स्तंभो तथा काशी गंगा के सानिध्य में मोक्ष की अवधरणा पर खड़ा है। सैकड़ो वर्षो से यहाँ के निवासी एक पैर पर खड़े होकर साध्ना करते हुए अज्ञात सूर्य को अध्र्य देते आ रहे है, अर्थात् यहाँ के लोग सदा से धूम-कर्म में लगे हुए है। इसी से सांस्कृतिक विरासत बनी हुई है।

(ख) दिशा
हिमालय किध……. किध्र है।
मूलभाव-
केदारनाथ सिंह द्वारा रचित यह कविता बाल मनोविज्ञान पर आधरित है। बच्चे का भी अपना यथार्थ होता है ।
व्याख्या बिन्दु – कवि स्कूल के बाहर पतंग उड़ाते हुए बच्चे से पूछता है कि हिमालय किध्र है। पतंग उड़ाने में मस्त बच्चे से यह प्रश्न पूछना असामयिक है, फिर भी बालक स्वाभाविक रूप से उत्तर देता है कि जिध्र उसकी पतंग भागी जा रही है। लेखक ने पहली बार जाना कि हिमालय किध्र है अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है। बच्चे भी यथार्थ को अपने ढंग से देखाते है, उस बच्चे का यथार्थ पतंग की दिशा में है। कवि बच्चे के बाल सुलभ ज्ञान पर मुग्ध् हो उठता है। कवि चाहता है कि हम बच्चों से कुछ न कुछ सीख सकते है।

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