रामचंद्रिका
(क) दंडक
बानी जगरानी……….तदपि नई नई।
व्याख्या बिन्दु – प्रस्तुत पंक्तियों में केशवदास ने माँ सरस्वती की उदारता और वैभव का गुणगान किया है। देवी सरस्वती की उदारता अपरंपार है उसे में बांध् कर सीमित नहीं किया जा सकता। वह सदैव नयापन लिए हुए है। अतः न तो कोई उसका गुणगान कर सका है, न कर सकता है और न कोई कर सकेगा। यह करने में देवता, सि षिराज, अनुभवी, तपस्वी भी हार चुके हैं। चार मुख वाले ब्रह्मा जी, पांच मुख वाले शिवजी तथा षट्मुख कार्तिकेय (पति, पुत्रा तथा नाती) हैं। वे भी उनकी महिमा का वर्णन नहीं कर पाये क्योंकि माँ सरस्वती की उदारता हर क्षण हर पल नए-नए रूपों में परिवर्तित होती है। उनकी उदारता अपरिमित है इसलिए उसका वर्णन असंभव है।
(ख) लक्ष्मण-उर्मिला
सब जाति पफटी………..जटी पंचवटी ।
व्याख्या बिन्दु- इस छंद में कवि ने पंचवटी के माहात्मय का सुंदर वर्णन किया है। लक्ष्मण और उर्मिला के संवाद द्वारा पंचवटी के सात्विक वातावरण का चित्राण करते हुए कवि कहता है कि यहाँ आने पर दुःखों का निवारण होता है। कपटी और धूर्त व्यक्ति निष्कपट और सदाचारी बन जाते हैं, पापियों के पाप नष्ट हो जाते हैं। ज्ञान की प्राप्ति होती है। प्राकृतिक सौन्दर्य से सुख की प्राप्ति तथा मोक्ष का आनंद उत्पन्न होता है। कवि कहता है कि पंचवटी शिव की जटाओं के समान कल्याणकारी है।
(ग) अंगद
सिंधु तर यो……… लंका जराई- जरी ।
व्याख्या बिन्दु- इन पंक्तियों में मंदोदरी (रावण की पत्नी) द्वारा श्री रामचंद्र के बल, महिमा प्रताप वर्णन किया गया है। मंदोदरी अपने पति रावण से सीता जी को श्री राम के पास वापस भेजने का अनुरोध् करती है किंतु रावण हठी होने के कारण सीता जी को श्रीराम के पास वापस भेजने को तैयार नहीं था। अतः मंदोदरी रावण को उलाहना देकर उसे श्रीराम के बल एवं प्रताप का आभास करा रही है। वह कहती है कि उनके वानर अर्थात् हनुमान ने समुद्र लांघ लिया, लक्ष्मण द्वारा सीता की रक्षा के लिए खींची गई रेखा को रावण नहीं लांघ सका, रावण हनुमान को बाँध नहीं सका, श्री राम की सेना ने समुद्र बाँध कर पुल बना लिया। तुमने (रावण ने) हनुमान की पूँछ को जलाना चाहा वह तो संभव न हो सका पर लंका जल गई। मंदोदरी के कहने का तात्पर्य यह है कि रावण, श्रीराम के समाने तुम्हारा बल और प्रताप बहुत कम है अतः तुम सीता को वापस भेज दो।